Wednesday, July 11, 2018

हास्य-व्यंग संक्षिप्तीकरण का कमाल

हास्य-व्यंग   
                
                                       संक्षिप्तीकरण का कमाल
बेटा:  पिताजीआपने मेरा नाम छोटू मोहन क्यों रखा था?
पिता: 50  साल बाद आज तेरे को यह प्रश्न कहाँ से खड़ा हो गयाआज तक पहले तो कभी यह प्रश्न नहीं किया?
बेटा:  आप मेरी सुनते कहाँ हैं?
पिता:   तो तेरा मतलब मैं तेरा नाम तेरे को पूछ कर रखताजब हम नामकरण करते हैं तब बच्चे की उम्र केवल 11 /13 दिन की होती है. तेरा मतलब तब मैं तुझसे पूछता कि तेरा नाम क्या रखूँ?
बेटा:  आपने मेरा नाम बाद में बदल देना था.
पिता:  बेटाअपने बच्चे का नाम रखना माता-पिता का ही अधिकार होता है.
बेटा:   मुझे पिताजी स्कूल में मेरे सहपाठी छोटू-मोटू कह कर चिढ़ाते थे.
पिता:   तो क्या हुआ?  स्कूल और कालिज में तो ऐसा चलता ही है. किस के साथ ऐसा नहीं होतामेरे साथ भी हुआ और मेरे पूर्वजों के साथ भी. तेरे बच्चों के साथ भी हुआ. यह होता है और होता ही रहेगा. बचपन में यह सब चलता ही है. इसमें बुरा मानाने की कोई बात नहीं है.
बेटा:  पर पिताजी लोग तो आज भी मुझे मेरा नाम लेकर चिढ़ाते हैं.
पिता:   बेटाइसमें बुरा नहीं मानते. हंसना-खेलना ही तो ज़िंदगी है.
बेटा:    पर आपको तो इसका ध्यान रखना चाहिए था.
पिता:   मेरा समय तो बीत गया पर तू ऐसा करना और अपने बच्चों को भी सलाह देना.
बेटा:    भला हो पिताजी हमारे अँगरेज़ शासकों का. उन्हें हम यूं ही गालियां देते रहते हैं. उन्हों ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है.
पिता:   तेरे लिए क्या कर गए अँगरेज़ जो तुम उनके बड़े प्रशंसक बन बैठे हो?
बेटा:    उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया. पर मैं अभी केवल नाम की ही बात करता हूँ.
पिता:   मुझे समझा.
बेटा:    उनके हमरी पावन धरती पर कदम रखने से पूर्व हम सदा अपना और दुसरे के पूरा नाम ही लिखते और पुकारते थे. पर उन्होंने हमें सिखाया कि किस प्रकार ऐसी शर्मिंदगी और कटाक्ष से बचा जा सकता है.
पिता:   उन्होंने क्या करिश्मा कर दिखाया?
बेटा:    उन्होंने हमें नामों के संक्षिप्तिकरण की पद्धति से अवगत कराया और उसका तरीका समझाया जो बिलकुल सरल था.
पिता:    कैसे?
बेटा:     आपने तो मेरा नाम रख दिया छोटे मोहन. उन्होंने हमारे को अपनी नाम के साथ अपनी जाति और परिवार का नाम साथ जोड़ने की प्रेरणा दी.
पिता:   तो तूने क्या किया?
बेटा:    मैंने अपने नाम को संक्षिप्त कर सी. एम. बना दिया और उसके साथ अपनी उपजाति जोड़ दी लखपतिया और मेरा नाम बन गया सी एम लखतिया. लोग मुझे पुकारने लगे सी एम लखपतिया. यह मुझे बहुत अच्छा लगने लगा.
पिता:   तू कहाँ से बन बैठा लखपतियायह तो मेरी उपजाति नहीं है.
बेटा:    इससे क्या फर्क पड़ता हैकोई नहीं पूछता या इतराज़ करता. मुझे तो कोई जाति का लाभ तो लेना नहीं है कि कोई मुझ से जाति का प्रमाणपत्र मांगेगा. नाम तो जचता है न. पहले तो मुझे अपना नाम बताने में भी शर्म आती थी.
पिता:   पर कल को तो मुझे भी कोई पूछ बैठेगा कि यह कौनसी उपजाति हैतो मैं क्या जवाब दूंगा?
बेटा:     आपने कह देना कि यह हमारे पूर्वजों की उपजाति है. जो उनकी थी वह ही हमारी है. इसमें तर्क-कुतर्क का कोई स्थान नहीं है.
पिता:   अपनी जाति-उपजाति ग़लत लिखना या बताना भी तो ग़लत है.
बेटा:    यह तो तब होता है जब कोई अपनी ग़लत जाति या उपजाति बता कर अनुचित लाभ उठाना चाहता हो.
पिता:   किसी को किसी की जाति से पुकारना अपराध है और उसे ज़मानत भी नहीं मिलती.
बेटा:    मेरे मामले में ऐसी कोई बात नहीं है. पर आप ठीक कह रहे हैं. कुछ जातियां ऐसी अवश्य हैं जिनका नाम लेकर किसी को पुकारना अपराध है और उसे सीधे जेल जाना पड़ता है.
पिता:   पर यह भी सच है कि जब उन जातियों के लोगों को कोई लाभ लेना होता है तो वह स्वयं गर्व के साथ कहते हैं कि मैं अमुक जाति का हूँ और उस कारण वह लाभ मांगते हैं और उन्हें मिलता भी है.
बेटा:   यह तो पिताजीउनका विशेष अधिकार है. पर यह बताएं कि आजकल तो अनेक जातियां अपने को अनुसूचित जातियों में शामिल करवाना चाहती हैं. वह छाती ठोक कर कहते हैं कि हम अमुक जाति के हैं. यदि उनका नाम भी अनुसूचित जाति में शामिल हो गया तो क्या उनके नाम को भी उनकी जाति से पुकारने पर अपराध बन जायेगा?
पिता:  यह प्रश्न तो तेरा बड़ा सटीक है. हम लोग और वह स्वयं भी अपना नाम न बता कर यही कहते हैं — मैं शर्मा बोल रहा हूँसेठ बोल रहा हूँमेरे पास इसका उत्तर नहीं है.
बेटा:   पर पिताजीपिछले दिनों हमारे भारत रत्न डॉ भीमराव रामजी अम्बेदकर के नाम पर क्या विवाद हो गया?
पिता:   बेटायहाँ भी राजनीति ही की जा रही थी. हमारे संविधान के निर्माता डॉ अम्बेदकर को व्यर्थ ही राजनीती में घसीटा जा रहा है वोट पर नज़र रख कर. जब उनका नाम यही है तो राजनीति के आज के महारथी उनका पूरा नाम लिखने पर क्यों ऐतराज़ कर रहे हैंक्या उनके पूरे नाम को बदलने का किसी व्यक्ति को चाहे वह उनके परिवार से ही क्यों न होअधिकार हैयह फ़िज़ूल की राजनीति है.
बेटा:   ऐसे तो पिताजी राजनीति के कई महारथियों के नाम के साथ देवी-देवताओं के नाम जुड़े हैं. तो क्या वह सब सांप्रदायिक हैंउनको भी अपना नाम बदल लेना चाहिए?
पिता:   यह कैसे हो सकता है?
बेटा:   मैं आपको एक और घटना सुनाऊँ. एक व्यक्ति की धर्मपत्नी का देहांत हो गया. उसने अपने नाम की पट्टिका पर अपने नाम के साथ लिख दिया BA. इसे देखकर उसके एक मित्र ने कहा — तू तो मेट्रिक भी नहीं हैतूने अपने नाम के साथ BA कैसे लिख दियाउसने कहा मेरा BA से मतलब है: "Bachelor Again" . कुछ समय के बाद उसने देखा कि उस के नाम के आगे लिखा है MA . जब मित्र ने दोबारा पूछा तो उसने स्पष्ट किया: "Married Again" .
पिता:  यह तो अजीब उदाहरण है.
बेटा: यही नहीं. अंग्रेज़ो ने तो हम पर बड़ा एहसान किया जिनके नाम उनके माता-पिता ने जाने-अनजाने में ग़लत व अजीबोग़रीब रख दिए थेउनको बड़ी राहत मिली. जैसे बुद्धू राम शर्मा,  छज्जू राम वर्मा,  छांगा राम बोध निखट्टू राम विलायती झाड़ू राम वेदांती आदि रख दिया,  वह भी गर्व से अपना नाम बताने लगे. सब हो गए बी. आर. शर्मा,  सी आर वर्मासी आर बोधएन आर विलायतीजे आर वेदांती आदि. सब छाती तान कर अपना नाम बताने लगे. इस से पूर्व तो उनको अपना नाम बताने में भी झेंप आती थी. 
पिता:  पर इसमें भी तो कठिनाई है. लोग उनका पूरा नाम ही नहीं जानते थे. हम उनके संक्षिप्त नाम को तो जानने लगे पर कोई यह पूछ बैठे कि अमुक का पूरा नाम क्या है तो हम इधर-उधर देखने लगते थे क्योंकि हमारे को उनका पूरा नाम ही पता न होता था.
बेटा: यही नहीं. अंग्रेज़ो तो हम पर बड़ा एहसान किया. जिनके नाम उनके माता-पिता ने जाने-अनजाने में ग़लत व अजीबोग़रीब रख दिए थेउनको बड़ी राहत मिली. जैसे बुद्धू राम शर्मा,  छज्जू  राम वर्मा,  छांगा राम बोध निखट्टू  राम विलायती झाड़ू राम वेदांती आदि रख दिया,  वह भी गर्व से अपना नाम बताने लगे. सब हो गए बी. आर. शर्मा,  सी आर वर्मासी आर बोधएन आर विलायतीजे आर वेदांती आदि. सब छाती तान कर अपने नाम बताने लगे. इस से पूर्व तो उनको अपना नाम बताने में भी झेंप आती थी.     
पिता:  पर इसमें भी तो कठिनाई है. लोग उनका पूरा नाम हे नहीं जानते थे. हम उनके संक्षिप्त नाम को तो जानने लगे पर कोई यह पूछ बैठे कि अमुक का पूरा नाम क्या है तो हम इधर-उधर देखने लगते थे क्योंकि हमारे को उनका पूरा नाम ही पता न होता था. कई बार तो हम अपने ही नज़दीकी रिश्तेदारों के पूरे नाम न जानने लगे. सीएमकेकेवी आर बन कर रह गए.
बेटा:   यह तो आपकी बात ठीक है. मैं ही कई अपने दोस्तों के पूरे नाम नहीं जानता.
पिता:  इस संक्षिप्तीकरण का ही कमाल है कि कई शहरों के नाम ही बदल गए. असली नाम क्या हैबहुतों को पता ही नहीं रहता.
बेटा:   जैसे?
पिता:   तुम्हारे को पता है कि नोयडा का असली नाम क्या है?
बेटा:   नहीं.
पिता:  न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी. पर अब तो यह शहर का नाम बन गया है.
बेटा:   और भी है कोई ऐसा स्थान?
पिता: कई हैं पर केवल एक और का ही बताता हूँ. वह है एस ए एस नगर. यह नाम पंजाब सरकार ने मोहाली का बदल कर रखा था. इसका असली नाम है साहिबज़ादा अजीत सिंह नगर. पर लोग या तो इसे मोहाली ही कहते रहते हैं या फिर एस ए एस नगर. और भी कई उदहारण हैं.
बेटा:   बताओ न.


पिता:  हमारे राष्ट्रपिता का नाम मोहनदास करमचंद गांधी है. पर 100 में से एक-दो ही यह बता पाएंगे. नयी पीढ़ी तो बहुत कम. वह भी अब महात्मा गांधी बन कर रह गए हैं.   ***
Courtesy: Udayindia Hindi weekly

Wednesday, February 14, 2018

हास्य-व्यंग जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

हास्य-व्यंग
   कानोंकान नारदजी के
          जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

शर्म नाम की चीज़े हमारे देश से लुप्त होती जा रही है।  यह तो अच्छा लक्षण है. राजनीति के लोगों के लिए तो यह बहुत  अच्छी चीज़ है. यदि राजनीति के लोग ज़रा=ज़रा सी बात पर दुखी और शर्मिंदा होने लगेंगे तो काम कैसे चलेग।  अगर छोटी-छोटी बात पर हमारे राजनीनीति के महारथी मुंह छुपा कर घर की चारदीवारी में ही अपने आप को स्वयं ही घर में बंदी बनाने लगे तो हो गयी समाजसेवा और देशभक्ति।
यदि कोई नेता छोटी-छोटी बात पर दुखी होने लगेगा तो वह देश सेवा क्या खाक करेगा? राजनीनीति में गाली दी भी बहुत जाती है और खाई भी बहुत। इस लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है. गाली को तो ऐसे डकारना चाहिए जैसे अपनी फेवरिट दाल भाजी। लोग काले झंडे दिखाएंगे. फूलमाला के स्थान पर आप पर टमाटर, अण्डे फेंकेंगे। कई तो जूते भी फेंकने लगे हैं. जूतों का हार पहनाने का प्रयास करते हैं. इसलिए राजनीतिज्ञ को तो बड़ा दिल रखना होगा. उदारवादी बनना होगा. विरोधियों का हर मोर्चे पर मुकाबला करना होगा. कुछ भी हो जाये उनपर विजय तो हर सूरत में पानी हर बड़ी से बड़ा क़ुरबानी देकर भी.
अब वह दिन दूर हुए जब नेता लोग मात्र संदेह या किसी द्वारा आरोप लगाने पर ही पद त्याग देते थे हालाँकि अभी कोई जांच भी न हुई होती, आरोप तो साबित होना दूर की बात थी. तब कहते थे कि वह नैतिकता के आधार पर और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसा कर रहे हैं.कहाँ लिखा है कि राजनीति में नैतिकता नाम की भी कोई चीज़ होती है. आत्मा तो हर प्राणी में होती है पर यह अंतरात्मा क्या होती है? राजनीति में तो यह वस्तु पाई नहीं जाती. या यूं कहा जा सकता है कि ज्यों ही कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करता है, उसकी आत्मा तो रहती है पर अंतरात्मा बाई-बाई कर जाती है. अब तो राजनीज्ञ यह कहते हैं कि अभी तक तो केवल आरोप हैं जो सिद्ध नहीं हुए हैं. जब तक कोई अदालत उन्हें दोषी नहीं ठहराती तब तक वह निर्दोष हैं. जब कोई अदालत उन पर आरोप लगा देती है तो कहते हैं अभी फैसला नहीं सुनाया. जब निचली अदालत उन्हें दोषी करार दे कर सजा सुना देती है तो कहते हैं, अभी उच्तम न्यायालय पड़ा है. वह जब निर्णय देगा तभी अंतिम होगा. यदि वह भी दोष और सजा बनाये रखे तो कहते हैं कि वह जनता की अदालत में जायेंगे जो सब से बड़ी होती है.
शर्म नाम की बात तो राजनीतिक नेता को भूल ही जानी चाहिए. ठीक ही तो लोग कहते हैं, विशेषकर पंजाब में कि जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म (भाग्य). यह भी कहते हैं कि शर्म तो आने-जाने  वाली चीज़ है, आदमी को बेशर्म होना चाहिए.
 हमारे नेतागण ने भी यही अच्छी आदर्शवादी सीख ले ली है. चाहे उनके घर पुलिस आये, चाहे उनके घर पुलिस, आयकर  विभाग छापा मारे, प्रवर्तन निदेशालय संपत्ति  उनकी को ज़बत कर ले, वह तो पुलिस की हिरासत में सीना तान कर  हँसते-मुस्कराते  दो उंगलियों से विजय का संकेत इस प्रकार देते जाते हैं मानो मानो कोई फौजी अफसर दुश्मन पर विजय प्राप्त कर लौटा हो और अब वह दूसरे मोर्चे पर विजय के लिए जा रहे हों.
जब पत्रकार उनसे प्रश्न करते हैं तो वह तो बड़े दम-ख़म से कह देते हैं कि यह सब उनके सत्तासीन विरोधियों की चाल है. हमने कुछ नहीं किया है. हम निर्दोष हैं. हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है. हम उनके मंसूबे विफल कर निकलेंगे. उनके सारे षड्यंत्रों को विफल कर रख देंगे. यह सब मामले राजनीति से प्रेरित है. चरित्रहरण का एक भौंडा प्रयास. उनके विरुद्ध आरोप झूठे और निराधार हैं.  अभिमन्यु तो कौरवों द्वारा बिछाए गए चक्रव्यूह से नहीं निकल पाया था, पर हम कर के दिखा देंगे. चाहे हो हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री राजा वीरभद्र सिंह या बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनके भाषा और तर्क एक ही है. लालूजी ने तो 70 के दशक में जाननायक जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था. क्या विडंबना है कि आज लालूजी को भ्रष्टाचार के आरोपों में ही अब तक चारा घोटाले के तीन मुकदद्मों में 13 साल और छह: महीनों व लाखों रुपये का जुर्माना हो चुका है. अभी और कुछ मामले अदालत के विचाराधीन हैं. 
यही नहीं. भारत एक है और उसके नेता भी एक हैं. नेता कोई भी हो, किसी पार्टी का हो, किसी प्रदेश का हो. उसकी भाषा अलग हो सकती है, पर जब उस पर कोई मामला बनता है तो सब की भाषा एक हो जाती है. कोई नहीं मानता कि उसने कोई ग़लती की है.कोई अपना कसूर नहीं मानता कि उसने जाने-अनजाने में कोई कसूर किया है. सारा दोष सब अपने विरोधियों, विशेषकर सत्ताधारी दल के सिर मढ़ देते हैं.. यही उदगार आजकल पूर्व केंद्रीय मंत्री पी सी  चिदंबरम बोल रहे हैं. वह कहते हैं कि उनपर और उनके पुत्र पर सरकार की सारी कार्रवाई उनकी जुबान बंद करने के लिये हैं, सरकार के विरुद्ध लिखने पर उनकी कलम को रोकने के लिए की जा रही हैं. उन्होंने ज़ोर देकर दोहराया कि कोई उनकी ज़ुबान पर रोक लगा सकता हैं और न उनकी लेखनी पर ही.
लालूजी ने कब स्वीकार किया था कि उन्होंने कोई अपराध किया हैं पर फिर भी अदालत ने उनको तीन मामलों में सजा सुना दी.
वैसे ऐसे दलेर लोग केवल राजनीति में ही नहीं होते. अन्य व्यवसायों में भी पाए जाते हैं. एक महानुभाव ऐसे थे कि कभी अफसर नाराज़ भी हो जाये तो वह कभी नहीं कहते थे कि वह नाराज़ होकर उसे भला-बुरा सुना रहा था. उलटे कमरे से हँसते हुये निकलते और कहते कि अफसर उसकी बड़ी तारीफ कर रहा था. मुझे और देर बैठने को कह रहा था. कह रहा था कि बैठ दोनों इकट्ठे चाय पीते हैं. मैंने कहा, सर इस समय रहने दीजिये फिर सही. इस समय आपके पास काम भी बहुत हैं और कुछ लोग आपसे  मिलने को भी बैठे हैं. फिर कभी फुर्सत में सही'.
एक व्यक्ति एक प्रदेश सचिवालय मैं काम करते थे. अपने काम के लिए एक सीमेंट बनाने वाली कंपनी के एक अधिकारी उसके पास अक्सर आते रहते थे. वह उनका काम तुरंत कर देता था. उसके इस व्यवहार से खुश होकर उसने उस व्यक्ति को उसकी बीवी के नाम पर सीमेंट की एजेंसी दे दी. उस व्यक्ति की किसी ने शिकायत कर दी कि उसने अपने प्रभाव का ग़लत उपयोग कर अपनी बीवी के नाम एक एजेंसी ले रखी हैं. उसके अधिकारियों ने उसे नोटिस दे दिया कि वह तुरंत अपनी एजेंसी कैंसिल करवा दे वरन उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाएगी.
वह व्यक्ति भी कोई मुंह छुपाने वाला डरपोक न निकला. उसने  विभाग को अपने स्पष्टीकरण में लिखा कि मेरी बीवी ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया हैं. वह मुझ से बड़े घर की बेटी हैं. वह कहती हैं कि मेरा वेतन बहुत थोड़ा हैं और वह उससे सारे घर कर खर्च नहीं चला सकती. इसलिए एक ही रास्ता हैं. मैं उसे तलाक़ दे दूँ. पर मेरी उम्र अभी जवान हैं. मैं पत्नी के बिना जीवन नहीं बिता सकता, इसलिए मुझे दूसरी शादी करनी पड़ेगी. पर मैं एक ग़रीब आदमी हूँ जो यहाँ सहायक के रूप में सेवा कर रहा हूँ. इसलिए यदि मेरा विभाग मेरी दूसरी शादी का खर्च वहन करने को तैयार हो जाये तो में अपनी बीवी को तलाक़ देने को तैयार हूँ.
विभाग को ही शर्म आ गयी. उसने उस  व्यक्ति को कोई उत्तर न दिया.  विभाग को ही शर्म आ गयी कि उसने ऐसा नोटिस ही जारी क्यों किया. उसके स्थान पर कोई व्यक्ति होता तो वह दर-दर ठोकरे खाता. मिन्नतें करता कि उसकी नौकरी बचा दो. जगह-जगह नाक रगड़ते फिरता.
इसी प्रकार एक और कर्मचारी था, उसकी पत्नी ने एक प्राइवेट स्कूल चला रखा था पर उस ने अपने विभाग को कुछ नहीं बताया था. उसे भी विभाग ने नोटिस भेज दिया कि वह बताये कि उसकी बीवी ने व्यवसाय चला रखा हैं. उसने विभाग को उत्तर दिया कि वह प्रातः 8 बजे घर से निकल जाता हैं अपनी ड्यूटी पर, शाम को घर  लौटता हैं. उसे नहीं पता कि उसकी बीवी उसकी ग़ैरहाज़िरी में क्या करती हैं, मैं उससे पूछ कर बताऊंगा. चार-छः महीने बीत गए. विभाग ने उसे याद दिलाया तो उसने उत्तर दिया कि उसकी बीवी धार्मिक यात्रा पर चली गयी हैं. उसके लौटने पर पूछ कर बताऊंगा. छः महीने बाद भी जब उत्तर न मिला तो विभाग ने उसे सूचना भेजने के लिए याद दिलाया. तब उस कर्मचारी ने उत्तर दिया कि उसकी बीवी उसे कुछ नहीं बताती. विभाग स्वयं ही सीधे उस से जानकारी प्राप्त कर ले. विभाग निरुत्तर हो गया.

ठीक ही तो है. अगर इन  महानुभावों ने भी शर्म की होती तो उनके भी कर्म (भाग्य) फूट ही जाता.
Courtesy: Uday India (Hindi)

हास्य-व्यंग जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

हास्य-व्यंग
   कानोंकान नारदजी के
          जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

शर्म नाम की चीज़े हमारे देश से लुप्त होती जा रही है।  यह तो अच्छा लक्षण है. राजनीति के लोगों के लिए तो यह बहुत  अच्छी चीज़ है. यदि राजनीति के लोग ज़रा=ज़रा सी बात पर दुखी और शर्मिंदा होने लगेंगे तो काम कैसे चलेग।  अगर छोटी-छोटी बात पर हमारे राजनीनीति के महारथी मुंह छुपा कर घर की चारदीवारी में ही अपने आप को स्वयं ही घर में बंदी बनाने लगे तो हो गयी समाजसेवा और देशभक्ति।
यदि कोई नेता छोटी-छोटी बात पर दुखी होने लगेगा तो वह देश सेवा क्या खाक करेगा? राजनीनीति में गाली दी भी बहुत जाती है और खाई भी बहुत। इस लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है. गाली को तो ऐसे डकारना चाहिए जैसे अपनी फेवरिट दाल भाजी। लोग काले झंडे दिखाएंगे. फूलमाला के स्थान पर आप पर टमाटर, अण्डे फेंकेंगे। कई तो जूते भी फेंकने लगे हैं. जूतों का हार पहनाने का प्रयास करते हैं. इसलिए राजनीतिज्ञ को तो बड़ा दिल रखना होगा. उदारवादी बनना होगा. विरोधियों का हर मोर्चे पर मुकाबला करना होगा. कुछ भी हो जाये उनपर विजय तो हर सूरत में पानी हर बड़ी से बड़ा क़ुरबानी देकर भी.
अब वह दिन दूर हुए जब नेता लोग मात्र संदेह या किसी द्वारा आरोप लगाने पर ही पद त्याग देते थे हालाँकि अभी कोई जांच भी न हुई होती, आरोप तो साबित होना दूर की बात थी. तब कहते थे कि वह नैतिकता के आधार पर और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसा कर रहे हैं.कहाँ लिखा है कि राजनीति में नैतिकता नाम की भी कोई चीज़ होती है. आत्मा तो हर प्राणी में होती है पर यह अंतरात्मा क्या होती है? राजनीति में तो यह वस्तु पाई नहीं जाती. या यूं कहा जा सकता है कि ज्यों ही कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करता है, उसकी आत्मा तो रहती है पर अंतरात्मा बाई-बाई कर जाती है. अब तो राजनीज्ञ यह कहते हैं कि अभी तक तो केवल आरोप हैं जो सिद्ध नहीं हुए हैं. जब तक कोई अदालत उन्हें दोषी नहीं ठहराती तब तक वह निर्दोष हैं. जब कोई अदालत उन पर आरोप लगा देती है तो कहते हैं अभी फैसला नहीं सुनाया. जब निचली अदालत उन्हें दोषी करार दे कर सजा सुना देती है तो कहते हैं, अभी उच्तम न्यायालय पड़ा है. वह जब निर्णय देगा तभी अंतिम होगा. यदि वह भी दोष और सजा बनाये रखे तो कहते हैं कि वह जनता की अदालत में जायेंगे जो सब से बड़ी होती है.
शर्म नाम की बात तो राजनीतिक नेता को भूल ही जानी चाहिए. ठीक ही तो लोग कहते हैं, विशेषकर पंजाब में कि जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म (भाग्य). यह भी कहते हैं कि शर्म तो आने-जाने  वाली चीज़ है, आदमी को बेशर्म होना चाहिए.
 हमारे नेतागण ने भी यही अच्छी आदर्शवादी सीख ले ली है. चाहे उनके घर पुलिस आये, चाहे उनके घर पुलिस, आयकर  विभाग छापा मारे, प्रवर्तन निदेशालय संपत्ति  उनकी को ज़बत कर ले, वह तो पुलिस की हिरासत में सीना तान कर  हँसते-मुस्कराते  दो उंगलियों से विजय का संकेत इस प्रकार देते जाते हैं मानो मानो कोई फौजी अफसर दुश्मन पर विजय प्राप्त कर लौटा हो और अब वह दूसरे मोर्चे पर विजय के लिए जा रहे हों.
जब पत्रकार उनसे प्रश्न करते हैं तो वह तो बड़े दम-ख़म से कह देते हैं कि यह सब उनके सत्तासीन विरोधियों की चाल है. हमने कुछ नहीं किया है. हम निर्दोष हैं. हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है. हम उनके मंसूबे विफल कर निकलेंगे. उनके सारे षड्यंत्रों को विफल कर रख देंगे. यह सब मामले राजनीति से प्रेरित है. चरित्रहरण का एक भौंडा प्रयास. उनके विरुद्ध आरोप झूठे और निराधार हैं.  अभिमन्यु तो कौरवों द्वारा बिछाए गए चक्रव्यूह से नहीं निकल पाया था, पर हम कर के दिखा देंगे. चाहे हो हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री राजा वीरभद्र सिंह या बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनके भाषा और तर्क एक ही है. लालूजी ने तो 70 के दशक में जाननायक जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था. क्या विडंबना है कि आज लालूजी को भ्रष्टाचार के आरोपों में ही अब तक चारा घोटाले के तीन मुकदद्मों में 13 साल और छह: महीनों व लाखों रुपये का जुर्माना हो चुका है. अभी और कुछ मामले अदालत के विचाराधीन हैं. 
यही नहीं. भारत एक है और उसके नेता भी एक हैं. नेता कोई भी हो, किसी पार्टी का हो, किसी प्रदेश का हो. उसकी भाषा अलग हो सकती है, पर जब उस पर कोई मामला बनता है तो सब की भाषा एक हो जाती है. कोई नहीं मानता कि उसने कोई ग़लती की है.कोई अपना कसूर नहीं मानता कि उसने जाने-अनजाने में कोई कसूर किया है. सारा दोष सब अपने विरोधियों, विशेषकर सत्ताधारी दल के सिर मढ़ देते हैं.. यही उदगार आजकल पूर्व केंद्रीय मंत्री पी सी  चिदंबरम बोल रहे हैं. वह कहते हैं कि उनपर और उनके पुत्र पर सरकार की सारी कार्रवाई उनकी जुबान बंद करने के लिये हैं, सरकार के विरुद्ध लिखने पर उनकी कलम को रोकने के लिए की जा रही हैं. उन्होंने ज़ोर देकर दोहराया कि कोई उनकी ज़ुबान पर रोक लगा सकता हैं और न उनकी लेखनी पर ही.
लालूजी ने कब स्वीकार किया था कि उन्होंने कोई अपराध किया हैं पर फिर भी अदालत ने उनको तीन मामलों में सजा सुना दी.
वैसे ऐसे दलेर लोग केवल राजनीति में ही नहीं होते. अन्य व्यवसायों में भी पाए जाते हैं. एक महानुभाव ऐसे थे कि कभी अफसर नाराज़ भी हो जाये तो वह कभी नहीं कहते थे कि वह नाराज़ होकर उसे भला-बुरा सुना रहा था. उलटे कमरे से हँसते हुये निकलते और कहते कि अफसर उसकी बड़ी तारीफ कर रहा था. मुझे और देर बैठने को कह रहा था. कह रहा था कि बैठ दोनों इकट्ठे चाय पीते हैं. मैंने कहा, सर इस समय रहने दीजिये फिर सही. इस समय आपके पास काम भी बहुत हैं और कुछ लोग आपसे  मिलने को भी बैठे हैं. फिर कभी फुर्सत में सही'.
एक व्यक्ति एक प्रदेश सचिवालय मैं काम करते थे. अपने काम के लिए एक सीमेंट बनाने वाली कंपनी के एक अधिकारी उसके पास अक्सर आते रहते थे. वह उनका काम तुरंत कर देता था. उसके इस व्यवहार से खुश होकर उसने उस व्यक्ति को उसकी बीवी के नाम पर सीमेंट की एजेंसी दे दी. उस व्यक्ति की किसी ने शिकायत कर दी कि उसने अपने प्रभाव का ग़लत उपयोग कर अपनी बीवी के नाम एक एजेंसी ले रखी हैं. उसके अधिकारियों ने उसे नोटिस दे दिया कि वह तुरंत अपनी एजेंसी कैंसिल करवा दे वरन उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाएगी.
वह व्यक्ति भी कोई मुंह छुपाने वाला डरपोक न निकला. उसने  विभाग को अपने स्पष्टीकरण में लिखा कि मेरी बीवी ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया हैं. वह मुझ से बड़े घर की बेटी हैं. वह कहती हैं कि मेरा वेतन बहुत थोड़ा हैं और वह उससे सारे घर कर खर्च नहीं चला सकती. इसलिए एक ही रास्ता हैं. मैं उसे तलाक़ दे दूँ. पर मेरी उम्र अभी जवान हैं. मैं पत्नी के बिना जीवन नहीं बिता सकता, इसलिए मुझे दूसरी शादी करनी पड़ेगी. पर मैं एक ग़रीब आदमी हूँ जो यहाँ सहायक के रूप में सेवा कर रहा हूँ. इसलिए यदि मेरा विभाग मेरी दूसरी शादी का खर्च वहन करने को तैयार हो जाये तो में अपनी बीवी को तलाक़ देने को तैयार हूँ.
विभाग को ही शर्म आ गयी. उसने उस  व्यक्ति को कोई उत्तर न दिया.  विभाग को ही शर्म आ गयी कि उसने ऐसा नोटिस ही जारी क्यों किया. उसके स्थान पर कोई व्यक्ति होता तो वह दर-दर ठोकरे खाता. मिन्नतें करता कि उसकी नौकरी बचा दो. जगह-जगह नाक रगड़ते फिरता.
इसी प्रकार एक और कर्मचारी था, उसकी पत्नी ने एक प्राइवेट स्कूल चला रखा था पर उस ने अपने विभाग को कुछ नहीं बताया था. उसे भी विभाग ने नोटिस भेज दिया कि वह बताये कि उसकी बीवी ने व्यवसाय चला रखा हैं. उसने विभाग को उत्तर दिया कि वह प्रातः 8 बजे घर से निकल जाता हैं अपनी ड्यूटी पर, शाम को घर  लौटता हैं. उसे नहीं पता कि उसकी बीवी उसकी ग़ैरहाज़िरी में क्या करती हैं, मैं उससे पूछ कर बताऊंगा. चार-छः महीने बीत गए. विभाग ने उसे याद दिलाया तो उसने उत्तर दिया कि उसकी बीवी धार्मिक यात्रा पर चली गयी हैं. उसके लौटने पर पूछ कर बताऊंगा. छः महीने बाद भी जब उत्तर न मिला तो विभाग ने उसे सूचना भेजने के लिए याद दिलाया. तब उस कर्मचारी ने उत्तर दिया कि उसकी बीवी उसे कुछ नहीं बताती. विभाग स्वयं ही सीधे उस से जानकारी प्राप्त कर ले. विभाग निरुत्तर हो गया.

ठीक ही तो है. अगर इन  महानुभावों ने भी शर्म की होती तो उनके भी कर्म (भाग्य) फूट ही जाता.
Courtesy: Uday India (Hindi)

हास्य-व्यंग जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

हास्य-व्यंग
   कानोंकान नारदजी के
          जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

शर्म नाम की चीज़े हमारे देश से लुप्त होती जा रही है।  यह तो अच्छा लक्षण है. राजनीति के लोगों के लिए तो यह बहुत  अच्छी चीज़ है. यदि राजनीति के लोग ज़रा=ज़रा सी बात पर दुखी और शर्मिंदा होने लगेंगे तो काम कैसे चलेग।  अगर छोटी-छोटी बात पर हमारे राजनीनीति के महारथी मुंह छुपा कर घर की चारदीवारी में ही अपने आप को स्वयं ही घर में बंदी बनाने लगे तो हो गयी समाजसेवा और देशभक्ति।
यदि कोई नेता छोटी-छोटी बात पर दुखी होने लगेगा तो वह देश सेवा क्या खाक करेगा? राजनीनीति में गाली दी भी बहुत जाती है और खाई भी बहुत। इस लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है. गाली को तो ऐसे डकारना चाहिए जैसे अपनी फेवरिट दाल भाजी। लोग काले झंडे दिखाएंगे. फूलमाला के स्थान पर आप पर टमाटर, अण्डे फेंकेंगे। कई तो जूते भी फेंकने लगे हैं. जूतों का हार पहनाने का प्रयास करते हैं. इसलिए राजनीतिज्ञ को तो बड़ा दिल रखना होगा. उदारवादी बनना होगा. विरोधियों का हर मोर्चे पर मुकाबला करना होगा. कुछ भी हो जाये उनपर विजय तो हर सूरत में पानी हर बड़ी से बड़ा क़ुरबानी देकर भी.
अब वह दिन दूर हुए जब नेता लोग मात्र संदेह या किसी द्वारा आरोप लगाने पर ही पद त्याग देते थे हालाँकि अभी कोई जांच भी न हुई होती, आरोप तो साबित होना दूर की बात थी. तब कहते थे कि वह नैतिकता के आधार पर और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसा कर रहे हैं.कहाँ लिखा है कि राजनीति में नैतिकता नाम की भी कोई चीज़ होती है. आत्मा तो हर प्राणी में होती है पर यह अंतरात्मा क्या होती है? राजनीति में तो यह वस्तु पाई नहीं जाती. या यूं कहा जा सकता है कि ज्यों ही कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करता है, उसकी आत्मा तो रहती है पर अंतरात्मा बाई-बाई कर जाती है. अब तो राजनीज्ञ यह कहते हैं कि अभी तक तो केवल आरोप हैं जो सिद्ध नहीं हुए हैं. जब तक कोई अदालत उन्हें दोषी नहीं ठहराती तब तक वह निर्दोष हैं. जब कोई अदालत उन पर आरोप लगा देती है तो कहते हैं अभी फैसला नहीं सुनाया. जब निचली अदालत उन्हें दोषी करार दे कर सजा सुना देती है तो कहते हैं, अभी उच्तम न्यायालय पड़ा है. वह जब निर्णय देगा तभी अंतिम होगा. यदि वह भी दोष और सजा बनाये रखे तो कहते हैं कि वह जनता की अदालत में जायेंगे जो सब से बड़ी होती है.
शर्म नाम की बात तो राजनीतिक नेता को भूल ही जानी चाहिए. ठीक ही तो लोग कहते हैं, विशेषकर पंजाब में कि जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म (भाग्य). यह भी कहते हैं कि शर्म तो आने-जाने  वाली चीज़ है, आदमी को बेशर्म होना चाहिए.
 हमारे नेतागण ने भी यही अच्छी आदर्शवादी सीख ले ली है. चाहे उनके घर पुलिस आये, चाहे उनके घर पुलिस, आयकर  विभाग छापा मारे, प्रवर्तन निदेशालय संपत्ति  उनकी को ज़बत कर ले, वह तो पुलिस की हिरासत में सीना तान कर  हँसते-मुस्कराते  दो उंगलियों से विजय का संकेत इस प्रकार देते जाते हैं मानो मानो कोई फौजी अफसर दुश्मन पर विजय प्राप्त कर लौटा हो और अब वह दूसरे मोर्चे पर विजय के लिए जा रहे हों.
जब पत्रकार उनसे प्रश्न करते हैं तो वह तो बड़े दम-ख़म से कह देते हैं कि यह सब उनके सत्तासीन विरोधियों की चाल है. हमने कुछ नहीं किया है. हम निर्दोष हैं. हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है. हम उनके मंसूबे विफल कर निकलेंगे. उनके सारे षड्यंत्रों को विफल कर रख देंगे. यह सब मामले राजनीति से प्रेरित है. चरित्रहरण का एक भौंडा प्रयास. उनके विरुद्ध आरोप झूठे और निराधार हैं.  अभिमन्यु तो कौरवों द्वारा बिछाए गए चक्रव्यूह से नहीं निकल पाया था, पर हम कर के दिखा देंगे. चाहे हो हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री राजा वीरभद्र सिंह या बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनके भाषा और तर्क एक ही है. लालूजी ने तो 70 के दशक में जाननायक जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था. क्या विडंबना है कि आज लालूजी को भ्रष्टाचार के आरोपों में ही अब तक चारा घोटाले के तीन मुकदद्मों में 13 साल और छह: महीनों व लाखों रुपये का जुर्माना हो चुका है. अभी और कुछ मामले अदालत के विचाराधीन हैं. 
यही नहीं. भारत एक है और उसके नेता भी एक हैं. नेता कोई भी हो, किसी पार्टी का हो, किसी प्रदेश का हो. उसकी भाषा अलग हो सकती है, पर जब उस पर कोई मामला बनता है तो सब की भाषा एक हो जाती है. कोई नहीं मानता कि उसने कोई ग़लती की है.कोई अपना कसूर नहीं मानता कि उसने जाने-अनजाने में कोई कसूर किया है. सारा दोष सब अपने विरोधियों, विशेषकर सत्ताधारी दल के सिर मढ़ देते हैं.. यही उदगार आजकल पूर्व केंद्रीय मंत्री पी सी  चिदंबरम बोल रहे हैं. वह कहते हैं कि उनपर और उनके पुत्र पर सरकार की सारी कार्रवाई उनकी जुबान बंद करने के लिये हैं, सरकार के विरुद्ध लिखने पर उनकी कलम को रोकने के लिए की जा रही हैं. उन्होंने ज़ोर देकर दोहराया कि कोई उनकी ज़ुबान पर रोक लगा सकता हैं और न उनकी लेखनी पर ही.
लालूजी ने कब स्वीकार किया था कि उन्होंने कोई अपराध किया हैं पर फिर भी अदालत ने उनको तीन मामलों में सजा सुना दी.
वैसे ऐसे दलेर लोग केवल राजनीति में ही नहीं होते. अन्य व्यवसायों में भी पाए जाते हैं. एक महानुभाव ऐसे थे कि कभी अफसर नाराज़ भी हो जाये तो वह कभी नहीं कहते थे कि वह नाराज़ होकर उसे भला-बुरा सुना रहा था. उलटे कमरे से हँसते हुये निकलते और कहते कि अफसर उसकी बड़ी तारीफ कर रहा था. मुझे और देर बैठने को कह रहा था. कह रहा था कि बैठ दोनों इकट्ठे चाय पीते हैं. मैंने कहा, सर इस समय रहने दीजिये फिर सही. इस समय आपके पास काम भी बहुत हैं और कुछ लोग आपसे  मिलने को भी बैठे हैं. फिर कभी फुर्सत में सही'.
एक व्यक्ति एक प्रदेश सचिवालय मैं काम करते थे. अपने काम के लिए एक सीमेंट बनाने वाली कंपनी के एक अधिकारी उसके पास अक्सर आते रहते थे. वह उनका काम तुरंत कर देता था. उसके इस व्यवहार से खुश होकर उसने उस व्यक्ति को उसकी बीवी के नाम पर सीमेंट की एजेंसी दे दी. उस व्यक्ति की किसी ने शिकायत कर दी कि उसने अपने प्रभाव का ग़लत उपयोग कर अपनी बीवी के नाम एक एजेंसी ले रखी हैं. उसके अधिकारियों ने उसे नोटिस दे दिया कि वह तुरंत अपनी एजेंसी कैंसिल करवा दे वरन उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाएगी.
वह व्यक्ति भी कोई मुंह छुपाने वाला डरपोक न निकला. उसने  विभाग को अपने स्पष्टीकरण में लिखा कि मेरी बीवी ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया हैं. वह मुझ से बड़े घर की बेटी हैं. वह कहती हैं कि मेरा वेतन बहुत थोड़ा हैं और वह उससे सारे घर कर खर्च नहीं चला सकती. इसलिए एक ही रास्ता हैं. मैं उसे तलाक़ दे दूँ. पर मेरी उम्र अभी जवान हैं. मैं पत्नी के बिना जीवन नहीं बिता सकता, इसलिए मुझे दूसरी शादी करनी पड़ेगी. पर मैं एक ग़रीब आदमी हूँ जो यहाँ सहायक के रूप में सेवा कर रहा हूँ. इसलिए यदि मेरा विभाग मेरी दूसरी शादी का खर्च वहन करने को तैयार हो जाये तो में अपनी बीवी को तलाक़ देने को तैयार हूँ.
विभाग को ही शर्म आ गयी. उसने उस  व्यक्ति को कोई उत्तर न दिया.  विभाग को ही शर्म आ गयी कि उसने ऐसा नोटिस ही जारी क्यों किया. उसके स्थान पर कोई व्यक्ति होता तो वह दर-दर ठोकरे खाता. मिन्नतें करता कि उसकी नौकरी बचा दो. जगह-जगह नाक रगड़ते फिरता.
इसी प्रकार एक और कर्मचारी था, उसकी पत्नी ने एक प्राइवेट स्कूल चला रखा था पर उस ने अपने विभाग को कुछ नहीं बताया था. उसे भी विभाग ने नोटिस भेज दिया कि वह बताये कि उसकी बीवी ने व्यवसाय चला रखा हैं. उसने विभाग को उत्तर दिया कि वह प्रातः 8 बजे घर से निकल जाता हैं अपनी ड्यूटी पर, शाम को घर  लौटता हैं. उसे नहीं पता कि उसकी बीवी उसकी ग़ैरहाज़िरी में क्या करती हैं, मैं उससे पूछ कर बताऊंगा. चार-छः महीने बीत गए. विभाग ने उसे याद दिलाया तो उसने उत्तर दिया कि उसकी बीवी धार्मिक यात्रा पर चली गयी हैं. उसके लौटने पर पूछ कर बताऊंगा. छः महीने बाद भी जब उत्तर न मिला तो विभाग ने उसे सूचना भेजने के लिए याद दिलाया. तब उस कर्मचारी ने उत्तर दिया कि उसकी बीवी उसे कुछ नहीं बताती. विभाग स्वयं ही सीधे उस से जानकारी प्राप्त कर ले. विभाग निरुत्तर हो गया.

ठीक ही तो है. अगर इन  महानुभावों ने भी शर्म की होती तो उनके भी कर्म (भाग्य) फूट ही जाता.
Courtesy: Uday India (Hindi)

हास्य-व्यंग जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

हास्य-व्यंग
   कानोंकान नारदजी के
          जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म (किस्मत)

शर्म नाम की चीज़े हमारे देश से लुप्त होती जा रही है।  यह तो अच्छा लक्षण है. राजनीति के लोगों के लिए तो यह बहुत  अच्छी चीज़ है. यदि राजनीति के लोग ज़रा=ज़रा सी बात पर दुखी और शर्मिंदा होने लगेंगे तो काम कैसे चलेग।  अगर छोटी-छोटी बात पर हमारे राजनीनीति के महारथी मुंह छुपा कर घर की चारदीवारी में ही अपने आप को स्वयं ही घर में बंदी बनाने लगे तो हो गयी समाजसेवा और देशभक्ति।
यदि कोई नेता छोटी-छोटी बात पर दुखी होने लगेगा तो वह देश सेवा क्या खाक करेगा? राजनीनीति में गाली दी भी बहुत जाती है और खाई भी बहुत। इस लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है. गाली को तो ऐसे डकारना चाहिए जैसे अपनी फेवरिट दाल भाजी। लोग काले झंडे दिखाएंगे. फूलमाला के स्थान पर आप पर टमाटर, अण्डे फेंकेंगे। कई तो जूते भी फेंकने लगे हैं. जूतों का हार पहनाने का प्रयास करते हैं. इसलिए राजनीतिज्ञ को तो बड़ा दिल रखना होगा. उदारवादी बनना होगा. विरोधियों का हर मोर्चे पर मुकाबला करना होगा. कुछ भी हो जाये उनपर विजय तो हर सूरत में पानी हर बड़ी से बड़ा क़ुरबानी देकर भी.
अब वह दिन दूर हुए जब नेता लोग मात्र संदेह या किसी द्वारा आरोप लगाने पर ही पद त्याग देते थे हालाँकि अभी कोई जांच भी न हुई होती, आरोप तो साबित होना दूर की बात थी. तब कहते थे कि वह नैतिकता के आधार पर और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसा कर रहे हैं.कहाँ लिखा है कि राजनीति में नैतिकता नाम की भी कोई चीज़ होती है. आत्मा तो हर प्राणी में होती है पर यह अंतरात्मा क्या होती है? राजनीति में तो यह वस्तु पाई नहीं जाती. या यूं कहा जा सकता है कि ज्यों ही कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करता है, उसकी आत्मा तो रहती है पर अंतरात्मा बाई-बाई कर जाती है. अब तो राजनीज्ञ यह कहते हैं कि अभी तक तो केवल आरोप हैं जो सिद्ध नहीं हुए हैं. जब तक कोई अदालत उन्हें दोषी नहीं ठहराती तब तक वह निर्दोष हैं. जब कोई अदालत उन पर आरोप लगा देती है तो कहते हैं अभी फैसला नहीं सुनाया. जब निचली अदालत उन्हें दोषी करार दे कर सजा सुना देती है तो कहते हैं, अभी उच्तम न्यायालय पड़ा है. वह जब निर्णय देगा तभी अंतिम होगा. यदि वह भी दोष और सजा बनाये रखे तो कहते हैं कि वह जनता की अदालत में जायेंगे जो सब से बड़ी होती है.
शर्म नाम की बात तो राजनीतिक नेता को भूल ही जानी चाहिए. ठीक ही तो लोग कहते हैं, विशेषकर पंजाब में कि जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म (भाग्य). यह भी कहते हैं कि शर्म तो आने-जाने  वाली चीज़ है, आदमी को बेशर्म होना चाहिए.
 हमारे नेतागण ने भी यही अच्छी आदर्शवादी सीख ले ली है. चाहे उनके घर पुलिस आये, चाहे उनके घर पुलिस, आयकर  विभाग छापा मारे, प्रवर्तन निदेशालय संपत्ति  उनकी को ज़बत कर ले, वह तो पुलिस की हिरासत में सीना तान कर  हँसते-मुस्कराते  दो उंगलियों से विजय का संकेत इस प्रकार देते जाते हैं मानो मानो कोई फौजी अफसर दुश्मन पर विजय प्राप्त कर लौटा हो और अब वह दूसरे मोर्चे पर विजय के लिए जा रहे हों.
जब पत्रकार उनसे प्रश्न करते हैं तो वह तो बड़े दम-ख़म से कह देते हैं कि यह सब उनके सत्तासीन विरोधियों की चाल है. हमने कुछ नहीं किया है. हम निर्दोष हैं. हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है. हम उनके मंसूबे विफल कर निकलेंगे. उनके सारे षड्यंत्रों को विफल कर रख देंगे. यह सब मामले राजनीति से प्रेरित है. चरित्रहरण का एक भौंडा प्रयास. उनके विरुद्ध आरोप झूठे और निराधार हैं.  अभिमन्यु तो कौरवों द्वारा बिछाए गए चक्रव्यूह से नहीं निकल पाया था, पर हम कर के दिखा देंगे. चाहे हो हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री राजा वीरभद्र सिंह या बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनके भाषा और तर्क एक ही है. लालूजी ने तो 70 के दशक में जाननायक जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था. क्या विडंबना है कि आज लालूजी को भ्रष्टाचार के आरोपों में ही अब तक चारा घोटाले के तीन मुकदद्मों में 13 साल और छह: महीनों व लाखों रुपये का जुर्माना हो चुका है. अभी और कुछ मामले अदालत के विचाराधीन हैं. 
यही नहीं. भारत एक है और उसके नेता भी एक हैं. नेता कोई भी हो, किसी पार्टी का हो, किसी प्रदेश का हो. उसकी भाषा अलग हो सकती है, पर जब उस पर कोई मामला बनता है तो सब की भाषा एक हो जाती है. कोई नहीं मानता कि उसने कोई ग़लती की है.कोई अपना कसूर नहीं मानता कि उसने जाने-अनजाने में कोई कसूर किया है. सारा दोष सब अपने विरोधियों, विशेषकर सत्ताधारी दल के सिर मढ़ देते हैं.. यही उदगार आजकल पूर्व केंद्रीय मंत्री पी सी  चिदंबरम बोल रहे हैं. वह कहते हैं कि उनपर और उनके पुत्र पर सरकार की सारी कार्रवाई उनकी जुबान बंद करने के लिये हैं, सरकार के विरुद्ध लिखने पर उनकी कलम को रोकने के लिए की जा रही हैं. उन्होंने ज़ोर देकर दोहराया कि कोई उनकी ज़ुबान पर रोक लगा सकता हैं और न उनकी लेखनी पर ही.
लालूजी ने कब स्वीकार किया था कि उन्होंने कोई अपराध किया हैं पर फिर भी अदालत ने उनको तीन मामलों में सजा सुना दी.
वैसे ऐसे दलेर लोग केवल राजनीति में ही नहीं होते. अन्य व्यवसायों में भी पाए जाते हैं. एक महानुभाव ऐसे थे कि कभी अफसर नाराज़ भी हो जाये तो वह कभी नहीं कहते थे कि वह नाराज़ होकर उसे भला-बुरा सुना रहा था. उलटे कमरे से हँसते हुये निकलते और कहते कि अफसर उसकी बड़ी तारीफ कर रहा था. मुझे और देर बैठने को कह रहा था. कह रहा था कि बैठ दोनों इकट्ठे चाय पीते हैं. मैंने कहा, सर इस समय रहने दीजिये फिर सही. इस समय आपके पास काम भी बहुत हैं और कुछ लोग आपसे  मिलने को भी बैठे हैं. फिर कभी फुर्सत में सही'.
एक व्यक्ति एक प्रदेश सचिवालय मैं काम करते थे. अपने काम के लिए एक सीमेंट बनाने वाली कंपनी के एक अधिकारी उसके पास अक्सर आते रहते थे. वह उनका काम तुरंत कर देता था. उसके इस व्यवहार से खुश होकर उसने उस व्यक्ति को उसकी बीवी के नाम पर सीमेंट की एजेंसी दे दी. उस व्यक्ति की किसी ने शिकायत कर दी कि उसने अपने प्रभाव का ग़लत उपयोग कर अपनी बीवी के नाम एक एजेंसी ले रखी हैं. उसके अधिकारियों ने उसे नोटिस दे दिया कि वह तुरंत अपनी एजेंसी कैंसिल करवा दे वरन उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाएगी.
वह व्यक्ति भी कोई मुंह छुपाने वाला डरपोक न निकला. उसने  विभाग को अपने स्पष्टीकरण में लिखा कि मेरी बीवी ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया हैं. वह मुझ से बड़े घर की बेटी हैं. वह कहती हैं कि मेरा वेतन बहुत थोड़ा हैं और वह उससे सारे घर कर खर्च नहीं चला सकती. इसलिए एक ही रास्ता हैं. मैं उसे तलाक़ दे दूँ. पर मेरी उम्र अभी जवान हैं. मैं पत्नी के बिना जीवन नहीं बिता सकता, इसलिए मुझे दूसरी शादी करनी पड़ेगी. पर मैं एक ग़रीब आदमी हूँ जो यहाँ सहायक के रूप में सेवा कर रहा हूँ. इसलिए यदि मेरा विभाग मेरी दूसरी शादी का खर्च वहन करने को तैयार हो जाये तो में अपनी बीवी को तलाक़ देने को तैयार हूँ.
विभाग को ही शर्म आ गयी. उसने उस  व्यक्ति को कोई उत्तर न दिया.  विभाग को ही शर्म आ गयी कि उसने ऐसा नोटिस ही जारी क्यों किया. उसके स्थान पर कोई व्यक्ति होता तो वह दर-दर ठोकरे खाता. मिन्नतें करता कि उसकी नौकरी बचा दो. जगह-जगह नाक रगड़ते फिरता.
इसी प्रकार एक और कर्मचारी था, उसकी पत्नी ने एक प्राइवेट स्कूल चला रखा था पर उस ने अपने विभाग को कुछ नहीं बताया था. उसे भी विभाग ने नोटिस भेज दिया कि वह बताये कि उसकी बीवी ने व्यवसाय चला रखा हैं. उसने विभाग को उत्तर दिया कि वह प्रातः 8 बजे घर से निकल जाता हैं अपनी ड्यूटी पर, शाम को घर  लौटता हैं. उसे नहीं पता कि उसकी बीवी उसकी ग़ैरहाज़िरी में क्या करती हैं, मैं उससे पूछ कर बताऊंगा. चार-छः महीने बीत गए. विभाग ने उसे याद दिलाया तो उसने उत्तर दिया कि उसकी बीवी धार्मिक यात्रा पर चली गयी हैं. उसके लौटने पर पूछ कर बताऊंगा. छः महीने बाद भी जब उत्तर न मिला तो विभाग ने उसे सूचना भेजने के लिए याद दिलाया. तब उस कर्मचारी ने उत्तर दिया कि उसकी बीवी उसे कुछ नहीं बताती. विभाग स्वयं ही सीधे उस से जानकारी प्राप्त कर ले. विभाग निरुत्तर हो गया.

ठीक ही तो है. अगर इन  महानुभावों ने भी शर्म की होती तो उनके भी कर्म (भाग्य) फूट ही जाता.
Courtesy: Uday India (Hindi)