Saturday, August 1, 2020

हास्य-व्यंग मेरा नया धंधा


हास्य-व्यंग
                  
मेरा नया धंधा
-- अम्बा चरण वशिष्ठ 


बेटा:   पिताजी|
पिता:   हाँ, बेटा|
बेटा:   मेरी दुकान का काम तो चौपट हो गया है|
पिता:   क्यूं?
बेटा:   आजकल कोई ग्राहक आ ही नहीं रहा है|
पिता:   क्या हो गया?
बेटा:   पिताजी, आपको तो पता है आजकल कोरोना वायरस का प्रकोप चल रहा है| काम तो 80-80 प्रतिशत कम हो गया है| हमारी मार्किट वालों ने तो 60-60 प्रतिशत कीमतें कम कर दीं| अखबारों में इश्तिहार छपवाये  पर फिर भी  कोई सामान खरीदने निकलता ही नहीं है|
पिता:   बेटा, यह महामारी है ही ऐसी नामुराद कि सब घबरा गए हैं| अभी तक तो इसकी कोई दवाई-उपचार भी तो नहीं निकला है|
बेटा:  उलटे कई तो वह डाक्टर भी इसके शिकार हो गए हैं जो जनता की देखभाल कर रहे थे|
पिता:   बेटा, इस बीमारी  ने तो बड़े-बड़ों को नहीं बक्शा है| अनेक देशों के स्वास्थय मंत्री, प्रधान मंत्री तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति भी इसकी चपेट में आ गए हैं|
बेटा:  इस महामारी से तो जल्दी छुटकारा मिल पाने की आशा भी तो नहीं लगती|
पिता:   यह तो ठीक है| फिर तू क्या करेगा?
बेटा:   मुझे तो अब एक ही धंधा लग रहा है जो सदाबहार है और उसमें कभी मंदी नहीं आ सकती|
पिता:   वह कौनसा कमाल का धंधा है?
बेटा:   जन प्रतिनिधि अदला-बदली का| इस धंधे में सेल सारा साल चलती है| न इसमें कभी बिकने वालों की कमी आती है और न ही खरीदने वालों की ही |
पिता:   तू कोई अकल की बात कर| यह भी कोई धंधा है?
बेटा:   मैंने एक बार टीवी पर देखा था| जसपाल भट्टी होते थे न?
पिता:   हाँ’-हाँ| हास्य-व्यंगकार|
बेटा:   हाँ, वही| उनको मैंने एक टीवी शो में देखा था| वह कहते थे कि मैं ऐसा व्यापार करता हूँ| अब तो उनका स्वर्गवास हो गया है| तो मैं सोचता हूँ कि क्यूं न वही काम कर लूं?
पिता: अब भई मेरे को तो इस काम की समझ है नहीं| इसके लिए तू संसाधन कहाँ से लायेगा? इस काम में तो बहुत धन लगाना पड़ेगा| 
बेटा:   आप इसकी चिंता मत करो| पिताजी, यह तो काम ऐसा है जिसमें हींग लगे न फटकड़ी, रंग चोखा होय|
पिता:   फिर भी कुछ प्रबंध तो करना ही पडेगा|
बेटा:   कुछ नहीं बस अपनी दुकान का कायाकल्प करना पड़ेगा| अपना कार्यालय तो उच्च कारोबारी का लगना ही चाहिए| ठाठबाठ भी पूरा होना चाहिए न|  
पिता:   यह तो बेटा ठीक है| यदि कार्यालय का ताम-झाम न हो तो लोग समझते हैं कि इसका कोई काम नहीं चलता है|
बेटा:   आजकल तो पिताजी लोग चीज़ बाद मैं देखते हैं| वह तो वस्तु की पैकिंग देखते हैं| वह बढ़िया पैकिंग देखकर ही सामान खरीद डालते हैं|
पिता: लोग तो मेकअप देखकर ही प्रभावित हो जाते हैं| मेकअप उतर जाने पर किसी की शक्ल चाहे कितनी ही भौंडी क्यों न हो| बिना मेक-उप के तो कई बार लोग बड़े-बड़े अभिनेता-अभिनेत्रियों को भी पहचान पाने में विफल रहते हैं|
बेटा: फिर हमने तो जनप्रतिनिधि की सेवा करनी है| उसे बढ़िया अवसर दिलाने हैं| उनका वैभवशाली भविष्य सुनिश्चित करना है|
पिता:   कुछ भी है बेटा हाथ सोच-समझ कर ही डालना| इस राह में कांटे बहुत लगते हैं|
बेटा:  पिताजी जब गुलाब की खेती करनी है तो काँटों से खेलना तो  पड़ेगा ही|
पिता:   बातें तो आज तू बड़ी समझदारी की कर रहा है|
बेटा:   आखिर बेटा भी तो मैं आपका ही हूँ न|
पिता:  काम तू इसी दुकान से चलायेगा?
बेटा:  मैं दुकान के दरवाज़े घुसते ही एक सुंदर सी लडकी स्वागत केलिए बिठा दूंगा जिसकी मुस्कान ही आगंतुक हम से बड़ा प्रभावित हो जायेगा|
पिता:   पर यह भी न हो न कि ग्राहक पैकिंग देखकर सामान तो खरीद ले पर पैकिंग खोलते ही वह अपने आप को लुटा हुआ महसूस करने लगे|
बेटा:   ऐसे नहीं, पिताजी, कुछ भी हो मुझे तो अपने ग्राहकों को खुश और संतुष्ट करना ही होगा| वरन काम कैसे चलेगा?
पिता: यही तो बेटा, तेरी कामयाबी का साधन बनेगा|
बेटा:   आपको तो पता ही है कि आजकल चुनाव हर मौसम में होते रहते है| ठीक ही कहते हैं कि आम का तो मौसम होता है पर चुनाव का कोई नहीं| यह हर मौसम में पैदा होने वाला फल है| इसलिए जब भी चुनाव होंगे हर पार्टी को मेरी सेवाओं की ज़रुरत पड़ती रहेगी|
पिता: पर बेटा, जब से मोदीजी आये हैं उन्होंने तो चुनाव का नक्शा ही बदल कर रख दिया है| 2014 के चुनाव से पहले तो यह धारणा सब के मन में घर कर चुकी थी कि देश-प्रदेश में तो अब एक पार्टी के बहुमत और शासन के दिन लद गए| अब तो बस सांझा सरकारें ही चलेंगी| 
बेटा:   इस वातावरण में तो हम जैसे लोगों की सेवाओं की हर पार्टी को  ज़रुरत रहती थी| पर मोदीजी ने तो  केंद्र और कुछ प्रदेशों में भाजपा और एनडीए को स्पष्ट बहुमत दिलाकर आया-राम,गया-राम का धंधा ही चौपट कर दिया है|  
पिता:   फिर भी बेटा पीछे जब दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान व मध्य प्रदेश की विधान सभाओं के परिणाम निकले हैं उनसे तुम्हारे धंधे के रौशन होने के आसार बढ़ गए हैं|
बेटा:  बिलकुल ठीक| अब मध्य प्रदेश में जो कुछ भी हुआ हो उससे तो मेरेजैसे के भाग्य ही चमक उठे हैं| अब लगता है कि हमारे व्यवसाय की मांग बढ़ जाएगी|
पिता:   तूने पहले नहीं सोचा वरन मध्य प्रदेश में जो घटा उसमें तुम्हारी मांग बढ़ जाती|
बेटा:   यही तो मैं महसूस कर रहा हूँ|
पिता:  पर भाजपा ने तो अपने दम पर ही सरकार बना ली|
बेटा:   पर मैं तो कांग्रेस सरकार को बचा सकता था यदि कांग्रेस ने मेरी सेवायें प्राप्त की होतीं|
पिता:   बेटा वैसे तो चुनाव में प्रशांत किशोर जी भी बहुत सक्रिय रहते हैं| उनका करिश्मा इस बार कुछ चलता नहीं दिखा |
बेटा: हम दोनों के कार्यक्षेत्र अलग है| प्रशांत किशोर जी चुनाव अभियान में सक्रिय रहते हैं पर हमारा रोल आता है चुनाव परिणाम निकल जाने के बाद|
पिता:   पर प्रशांत भी तो सब जगह विजयी नहीं रहे हैं|  
बेटा:   पर हमारी कार्यप्रणाली अलग है| मैं तो मन, वचन और कथन से पूरी तरह सेकुलर रहूँगा| मैं सब पार्टियों को एक ही नज़र से देखूँगा| मेरे लिए कोई भी पार्टी अछूत नहीं होगी| मेरी सेवायें तो सब को उपलब्ध रहेंगी चाहे कोई किसी को सेकुलर समझता हो या साम्प्रदायिक| जो यह मध्य प्रदेश में घटा, मैं उसमें कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही अपनी सेवायें प्रस्तुत कर देता|
पिता: यह तो ठीक है|
बेटा:   मैं भी हमारे वकीलों के आदर्शों पर चलूँगा| वह सब के मुकद्दमें की पैरवी करते हैं   चोर के भी, साध के भी; हत्यारे के भी और निर्दोष के भी; बलात्कारी की भी और ब्लात्कात्कार की शिकार महिला की भी| उसी प्रकार मेरी दुकान के द्वार सब के लिए सदा खुले रहेंगे चौबीस घंटे हर दिन| पूरा साल 
पिता:   हाँ, तुझे करना तो ऐसे ही होगा| दुकानदार केलिए तो सब एक होते है| जब कोई ग्राहक उसके द्वार पहुँचता है तो वह यह नहीं जानना चाहता है कि उसकी जाति, धर्म और उसकी राजनितिक पार्टी का नाम नहीं पूछता| दुकानदार कोई भेदभाव नहीं बरतता |
बेटा: जब मैं ऐसे उच्च असूलों पर चलूँगा, तभी सफल हो पाऊँगा, पिताजी|
पिता:   तब अभी से काम शुरू करना पड़ेगा ताकि यदि कोई काम मिल जाये तो तेरे कार्यालय में आपा-धापडी न मच्च जाये|
बेटा:   मैं तो पिताजी हर समय युद्ध की स्तिथि में रहूँगा| फिर आप ही तो कहते हैं कि कोई नहीं जानता कि मौत और ग्राहक कब धमक जाये|
 पिता: हाँ, यह बात तो सच है ही|
बेटा:   किसी दल का एक पक्ष देर-सवेर अपनी पार्टी से दु:खी हो ही जाता है क्योंकि चुनाव के समय जनता के साथ किये गए वादों को सत्ताधारी दल पूरा नहीं कर रहा होता है| तब वह पार्टी में रह कर घुटन महसूस करने  लगता  है| उसके मन में अपने और अपनी पार्टी से पहले जनता और देश का हित सर्वोपरी होता है| ऐसी स्तिथी में डूसरे दल में जाकर जनसेवा कर सकता है| तब मेरी सेवाओं की सत्ताधारी और विपक्ष दोनों को ही मेरी सेवाओं की आवश्यकता पड़ जायेगी| मैं उस समय सत्ताधारी दल की सरकार को बचाने और गिराने दोनों में ही महत्वपूरण रोल अदा करूंगा| मेरी भूमिक भी वही रहेगी जो एक कानूनी विशेषज्ञ की होती है| उसके लिए हत्यारे को सजा से बचाना और  सजा दिलवाना एक समान होता है|
पिता:    तेरा काम भी तभी चलेगा|
बेटा:   जन प्रतिनिधियों को कहाँ ले जाना है ताकि वह विरोधी पक्ष की  काली नज़र दूर रहें,  यह मैं ही तय करूंगा| यह इतना गोपनीय रहेगा कि उनके विरोधी तो क्या, गूगल भी अपनी अति विकसित तकनालोजी  से उन्हें ढूंढ नहीं पायेगा|    
पिता:  यही तो आवश्यक है वरन तेरा सारा काम ही विफल हो जाएगा|
बेटा:   मैं उस दल के सभी प्रतिनिधियों को पांच-सात सितारा होटलों में ले जाऊंगा| उनके मनोरंजन केलिए उनकी इच्छानुसार सब प्रबंध करूंगा| डांसबार की सुविधा का भी प्रबंध करूंगा| जो जिस प्रकार का मनोरंजन चाहता है, मैं उसका प्रबंध कर दूंगा| घर से दूर उनके अज्ञातवास को मैं अविस्मरणीय बना दूंगा, इतना अविस्मरणीय कि वह चाहेंगे कि ऐसा मौक़ा उन्हें बार-बार मिले|  उनकी हरकतों की कोरियोग्राफी भी कर दूंगा ताकि कोई मुकर न सके|
पिता:   इस पर तो खर्च बहुत ज्यादा होगा?
बेटा:   यह तो ठीक है| पर सरकार बनाने या गिराने के लिए तो यह कुच्छ नहीं है| और एक फायदा और होगा|
पिता:   क्या?
बेटा:   जब मैं इन जनप्रतिनिधियों को लेकर जाऊंगा तो कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा पायेगा कि मैं किस के पक्ष और किसके विरोध में यह सब कर रहा हूँ|
पिता:  इस काम को तुझे बड़ी समझदारी से करना पड़ेगा|
बेटा:  यदि दोनों ही पक्ष मेरी सेवायें लेंगे तो 50 प्रतिशत छूट भी दे दूंगा| सावधानी और भी अधिक बढ़ा दूंगा|  ऐसी सावधानी कि बाएं हाथ को भी यह भनक न लग पाए कि दायाँ क्या कर रहा है |
पिता:   यह तो बेटा बड़ी ईमानदारी का आदर्श है जो पालिटिक्स में ओझल होता जा रहा है|
बेटा:   पर मैं इसे ओझल नहीं होने दूंगा| इसी आदर्श पर तो मेरी दूकान सजेगी| पार्टी पैसे खर्चने वाली होनी चाहिए| मैं तो उनको विदेश में बढ़िया स्थान पर ले जाऊं जहाँ पहुँच जाने का तो उन्होंने कभी सपने में भी न सोचा हो|
पिता:   यह  तो है| ऐसे मौके तो किसी होनहार और किस्मत वाले को ही मिल पाते हैं|
बेटा: अभी जो भोपाल में घटा, यदि उन्होंने मेरी सेवायें प्राप्त की होतीं तो मैं इस काम में भी अपनी छाप छोड़ जाता| मैं ऐसा काम कर दिखाता कि आगे के लिए ऐसे मौकों पर सभी मेरी ही सेवायें प्राप्त करना चाहते|
पिता: लगता है बेटा तेरा यह सपना भी जल्दी पूरा हो जाएगा|
बेटा:  कैसे?
पिता:  तू ने राजस्थान का तमाशा नहीं देखा?
बेटा:   मैंने इसे ध्यान से नहीं पढ़ा| आप ही बताओ|
पिता:   वहां तो विपक्ष के ही नहीं, सत्ता दल के जनप्रतिनिधियों को भी 5 सितारा होटलों में रखा गया है|  सब अपने-अपने होटलों में मौजमस्ती कर रहे हैं|
बेटा:  तब तो इसका मतलब है कि हमारा व्यवसाय दिन दुगनी रात
चौगुनी तरक्की करेगा|
पिता:  यही नहीं, अब तो वहां के मुख्य मंत्री भी कह रहे हैं कि विपक्ष ने सदस्यों को 25-50 करोड़ तक पहुँच गया है|
बेटा:   तब तो हम भी अपना रेट बढ़ा देंगे|
पिता: बेटा धंधा तो अच्छा है| यदि चल जाये तो बारे-न्यारे हो जायेंगे| ***
Courtesy: Uday India weekly Hindi