Thursday, February 28, 2013

जीवन ऐसा भी हाथ मिलाओ, आज से हम दोस्‍त


जीवन ऐसा भी
हाथ मिलाओ, आज से हम दोस्‍त 

एक पुलिस अधीक्षक को गाली देने की बहुत आदत थी। वह सब को गाली दे देते थे।

एक दिन उन्‍होंने अपने पीए को बुलाया। कुछ बात हुई और उन्‍होंने उसे गाली दे दी। पीए को गुस्‍सा आ गया और उसने तड़ाक से एसपी साहब को एक थप्‍पड़ जमा दिया।

एसपी चाहते तो पीए को नौकरी से ही निकलवा देते। पर ऐसी स्थिति में तो सब जगह यही चर्चा का विषय बन जाता कि एसपी साहब को उसके पीए ने ही चांटा मार दिया। एसपी सा‍हब ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुये तुरन्‍त अपने पीए की ओर अपना हाथ बढ़ाया। हाथ मिलाते हुये उन्‍होंने पीए को कहा, ''आज से हम दोनों दोस्‍त। यह बात अब बाहर नहीं जानी चाहिये।''

(किसी ने सुनाया था)
28-02-2013

Wednesday, February 27, 2013

जीवन ऐसा भी वह पाठ कर रहे हैं


जीवन ऐसा भी
वह पाठ कर रहे हैं

मेरे एक वरिष्‍ठ सहयोगी ने सुनाया एक किस्‍सा।

स्‍वतन्‍त्रता से पूर्व राजे-महाराजे जब किसी पर मेहरबान हो जाते थे तो वह खुश होकर किसी को भी या उसके बेटे को कोई भी पद दे देते थे। ऐसी ही एक कहानी है पंजाब की रियासत की। एक रियासत में राजा की मेहरबानी से बनाये गये ऐसे ही एक पुलिस अधीक्षक (ऐसपी) थे। उन्‍हें अंग्रेज़ी का तो एक शब्‍द भी नहीं आता था। इस लिये वह अपने साथ एक अंग्रेज़ी पढ़ा-लिखा सहायक साथ रखते थे।

एक बार रेल से प्रथम श्रेणी के डिब्‍बे में वह दिल्‍ली जा रहे थे कि उसी डिब्‍बे में पंजाब राज्‍य का एक ऐसपी भी जा रहा था। उसने अंग्रेज़ी में पूछा कि वह कहां के ऐसपी हैं तो उसके सहायक ने बता दिया। अंग्रेज़ ने कहा कि मैं उनसे कुछ आपसी बातचीत करना चाहता हूं। रियासत के उस ऐसपी को उसके सहायक ने अपनी भाषा में बताया। अब वह क्‍या बात करता\

उसने तुरन्‍त अपने धर्म की एक पुस्‍तक निकाली और उसका पाठ करना शुरू कर दिया। अपने सहायक को कह दिया कि वह अंग्रेज़ को बता दे कि मैं पाठ कर रहा हूं। स‍हायक ने ऐसा ही किया।

अंग्रेज़ अफसर थोड़ी-थोड़ी देर बात पूछे कि पाठ खत्‍म हुआ\ सहायक उसे बताये कि नहीं, अभी तो समय लगेगा। गाड़ी दिल्‍ली पहुंच गई पर उस रियासती ऐसपी का पाठ खत्‍म न हुआ। स्‍टेशन आने पर अंग्रेज़ अफसर उसका अभिवादन करते हुये गाड़ी से उतर गया तो उस रियासती ऐसपी की जान में जान आई।

27-02-2013

आज की फुहार 27-02-2013 भुलक्‍खड़ पति


आज की फुहार                             27-02-2013
भुलक्‍खड़ पति  

दो महिलायें अपने पतियों के भुलक्‍खड़पन से परेशान थीं। एक दूसरे से अपनी व्‍यथा वर्णन करते हुये एक ने कहा, ''बहन, क्‍या बताऊं। एक बार वह मुझे रास्‍ते में मिल गये तो कहने लगे कि मैंने आपको कहीं देखा है''।

दूसरी ने कहा, ''यह तो कुछ नहीं। एक दिन मेरे पति मुझे मार्किट में मिल गये तो बड़ा झुक कर बोले, ''बहिनजी, नमस्‍ते''।

(शायद धर्मयुग में पढ़ा था)

Tuesday, February 26, 2013

Rising prices a misery IT on DA & Pension a salt on wounds


Rising prices a misery
IT on DA & Pension a salt on wounds


By Amba Charan Vashishth

Price rise and rising inflation has rightly been called an indirect tax on the common man. The worst sufferer, however, is the population living below the poverty line. Yet no less are the miseries of the middle class consisting of the salaried class which gets its emoluments through cheques and government treasuries.
This class constitutes a major chunk of those who pay income tax regularly. This is because firstly, for this class no avenues to conceal their income are available and secondly, in its case the income comes first and expenses later. For those who run their own business, it is the reverse.  Their income is the remainder of their earnings after subtracting their expenses.  
The annual increment which a salaried person earns through hard work spanning the whole year has become immaterial in the face of jumps he gets after every six months in the form of increase in dearness allowance (DA) because of rising prices and inflation. This cannot be computed as his income. It is most inhuman to tax this as income generated because of rise in prices, an income forced on an unwilling person because of market forces in economy  over which he has no control and for which he is neither accountable nor responsible. If there is no rise in prices, there would be no increase in the DA. Even in private sector the annual increase in wages, to a large extent, is attributable to this rise in prices. So to consider this as income is irrational.
Rising prices and inflation is a double-edged weapon that cuts the salaried class from both sides. The neutralization of rise in prices is never hundred percent; it varies from 60 to 80 percent for different classes of workers. Therefore, on the one hand, while a salaried person continues to suffer the pain because of rise in prices even after a DA increase and, on the other, he is further made to pay through his nose a higher rate of income tax. This again is highly unreasonable. If there is no increase in prices, there would be no occasion and justification for increase in DA and consequently no jump in one's salary to pay a higher rate of income tax.
The fate of the pensioner is still worse. He doesn't get any annual increment. All the increase he gets in his pension is only because of the DA accruing because of rising prices. His savings get further gnawed away by the uncontrolled spurt in inflation.  By no stretch of economic argument and equity can DA be called income. On the one hand, he feels the pinch of rising prices and on the other, he is made to pay a higher rate of income tax because of increase in his DA.
Further, charging of income tax on the income accruing to salaried class because of an annual increment it earns through hard work and good performance plus a hike in his DA is discriminatory on the ground the hefty pay and perks the public representatives and ministers get – all considered as public servants – are exempt from income tax. A salaried person earns his pension after serving for at least 33 years but a public representative earns pension for life after functioning as such just after five years and even less. Yet, his income is not taxable. This discrimination is unjustified.
Therefore, DA and pension cannot, by no stretch of imagination and law of equity, be treated as income for purposes of income tax. It is time the finance minister takes cognizance of this hard reality and in the budget provides for exemption of DA and pension from the purview of income tax. This step would be most reasonable and equitable. 

Thursday, February 21, 2013

आज की फुहार 21-02-2013 जज साहिब, मेरे दोस्‍त को बचाओ


आज की फुहार                             21-02-2013

जज साहिब, मेरे दोस्‍त को बचाओ

एक व्‍यक्ति भागा-भागा एक जज की अदालत में घुस गया और ज़ोर-ज़ोर से चिल्‍लाने लगा, ''जज साहिब, मेरे दोस्‍त को बचाओ''।
जज ने पूछा, ''क्‍या हुआ''\
बिलखते हुये उसने कहा, ''साहिब, उसकी जि़न्‍दगी बर्बाद हो जायेगी। वह मेरी पत्नि से शादी करने जा रहा है।''
(कहीं पढ़ा था)

Wednesday, February 20, 2013

हास्‍य–व्‍यंग ईश्‍वर, हमारी सत्‍ता केलिये इनके गुनाह मुआफ कर दे


हास्‍य–व्‍यंग
ईश्‍वर, हमारी सत्‍ता केलिये इनके गुनाह मुआफ कर दे

बेटा:   पिताजी।

पिता:  हां, बेटा।

बेटा:   पिताजी, मैंने फैसला किया है कि मैं भी अब चुनाव लड़ूंगा।

पिता:  बेटा, यह बात छोड़। तू कैसे चुनाव लड़ पायेगा जब तेरे खिलाफ हत्‍या, डकैती, ब्‍लात्‍कार
आादि के एक दर्जन मुकद्दमें चल रहे हैं।

बेटा:   अभी तो फायदा है, पिताजी। लोग मुझ से डर कर ही वोट दे देंगे।
पिता:  चलो मान लिया कि तू जीत भी जायेगा, तो क्‍या हो जायेगा\
बेटा:  तब तो दोनों ही हाथों में लड्डू पिताजी।
पिता:  कैसे\
बेटा:   पिताजी, तब तो वही अफसर जो आज मुझे 'ऐ' कह कर पुकारते हैं और मुझ से
बदतमीज़ी करते हैं वही मुझ से मुआफी मांगने आयेंगे नाक रगड़ते और दया की भीख
      मांगेंगे। अपने गुनाहों पर शर्मिन्‍दा होंगे।
पिता:  बेटा, तेरे विरूद्ध इतने मुकद्दमें हैं कि तेरे को तो सरकार एक दम सदन से बाहर करवा
देगी।
बेटा:   पिताजी, लगता है आप अखबार नहीं पढ़ते। सरकार ने तो कह दिया है कि वह 162
सांसदों तथा प्रदेशों में विधायकों को इस कारण अयोग्‍य नहीं ठहरा सकती जब तक कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय भी उनके दोषी होने की मुहर न लगा दे। तब तक वह निर्दोष ही माने जायेंगे। दूसरे, सरकार ने तर्क दिया है कि केन्‍द्र और कई प्रदेश सरकारें ब्‍लेड की धार पर अपने न्‍यून्‍तम बहुमत से चल रही हैं। यदि यह सम्‍माननीय सदस्‍य ऐसे ही अयोग्‍य करार दे दिये गये तो अनेक सरकारें ही गिर जायेंगी।
पिता:  तो बेटा, सरकारें अपराधियों की बैसाखियों पर चलेंगी\
बेटा:  पिताजी, आप पता नहीं कौन से समय की राजनीति की बात करते है। आजकल की सोच
तो यह है कि सरकार चलनी चाहिये बैसाखियां चाहें किसी की हों।

पिता:  पर बेटा, तेरे मामलों में तो सुनवाई जल्‍द हो जायेगी और मुझे पता है तुम्‍हें सज़ा भी अवश्‍य होगी क्‍योंकि तेरे खिलाफ सबूत पक्‍के हैं।

बेटा:   पिताजी, आप बहुत भोले हैं। जब मैं चुना जाऊंगा तो उसके बाद मेरे विरूद्ध मुकद्दमें तो अपने आप ही ढीले पड़ जायेंगे। आपको पता है कि लालू व अन्‍य अनेक नेताओं के खिलाफ मुकद्दमें कछुआ चाल से पिछले दो दशक से चल रहे हैं। उनका कोई बाल-बांका कर पाया है क्‍या\

पिता:  बात तो तेरी ठीक है पर...........

बेटा:   पर क्‍या\ जब सैय्यां भये कोतवाल तो डर काहे का\ पिताजी, तब सरकार स्‍वयं चाहेगी    
कि हमारे पर आंच न आये क्‍योंकि हम पर आंच का मतलब होगा सरकार पर संकट। तो ऐसी स्थिति में कौन सी सरकार अपने पांव पर कुल्‍हाड़ी मारना चाहेगी\ मैं तो यहां तक आशावादी हूं कि यदि कोई सदस्‍य ईश्‍वर को भी प्‍यारा होने लगेगा तो सरकार ईश्‍वर के आगे भी गिड़गिड़ायेगी कि हमें सत्‍ता में बनाये रखने के लिये वह ऐसा ज़़ुल्‍म न ढाये।

पिता:  यह तो बेटा जाने तू और तेरी सरकार। 

Thursday, February 14, 2013

आज की फुहार 15-02-2013 मैं मेज़ नहीं उठा सकती थी


आज की फुहार                             15-02-2013

मैं मेज़ नहीं उठा सकती थी

एक पत्नि पर अदालत में मुकद्दमा चल रहा था कि उसने अपने पति पर कुर्सी दे मारी जिससे कि वह बुरी तरह घायल हो गया।
जज ने पूछा कि बताओ, तुमने पति पर कुर्सी क्‍यों मारी\

अपनी लाचारी जताते हुये बेचारी पत्नि ने कहा, ''साहब, मैं क्‍या करती\ मैं मेज़ नहीं उठा सकती थी।''
('धर्मयुग में पढ़ा था)

हास्‍य–व्‍यंग – किसके साथ मनाऊं 'किस्‍स डे', 'हग डे' व 'वैलन्‍टाइन डे'


हास्‍य–व्‍यंग
किसके साथ मनाऊं
'किस्‍स डे', 'हग डे' व 'वैलन्‍टाइन डे'\

बेटा:     पिताजी।
पिता:    हां बेटा।
बेटा:     आपको पता है न कि आज 'किस्‍स डे' है, कल 'हग डे'   
और दो दिन बाद 'वैलन्‍टाइन डे'।
पिता:    बेशर्म तुझे अपने बाप से ऐसी बातें करने में शर्म नहीं
आती\
बेटा:     पिताजी, आप भी क्‍या दकियानूसी बातें करते हैं। यह
21वीं सदी चल रही है। पश्चिम में तो पिता पिता नहीं एक मित्र माना जाता है। मैं भी आपको यही समझ रहा हूं।
पिता:    तू भारत में रहता है या पश्चिम में\
बेटा:     पिताजी, मैं रहता तो भारत में ही हूं पर आपको पता
हैं कि आजकल सभी पश्चिम के रास्‍ते चल कर आधुनिक बनना चाहते हैं।
पिता:    अपनी सभ्‍यता भूल कर\
बेटा:     पिताजी, आज कम्‍पोजि़ट सभयता का ज़माना है।
भारत इसी लिये तो पीछे रह गया कि उसने आध्‍यात्‍म व परम्‍पराओं के ही प्रसारण के लिये काम किया। आपको पता है कि आजकल वही दुकान काम्‍याब है जिस में हर तरह का सामान उपलब्‍ध है। इसलिये हमें भी यह सब करना चाहिये ताकि विदेशों से लोग केवल आध्‍यात्‍म व शिक्षा के लिये ही न आयें बल्कि मौज-मस्‍ती व भोग-विलास के लिये भी।
पिता:    यह भाषण तू किसके साथ मनाऊं औरों को दे। मुझे तू यह बता कि तू पूछना क्‍या चाहता है\
बेटा:     मैं अपनी पत्नि को किस्‍स व हग तो रोज़ ही करता हूं। उस से अपने प्‍यार का इज़हार भी रोज़ ही करता हूं। तो इन विशेष पर्वों पर यह सब विशेष रूप से किस अन्‍य विशेष महिला से मनाऊं\
पिता:    बदतमीज़, आगे के लिये कभी मेरे साथ ऐसी ओछी बातें मत करना। पूछना है तो अपने उन आधुनिक आक़ाओं से ही पूछ।

Tuesday, February 12, 2013

आज की फुहार 13-02-2013 भाई गाड़ी


आज की फुहार                             13-02-2013

भाई गाड़ी की मोशन ठीक करा दे

जम्‍मू-कश्‍मीर के एक मन्‍त्री थे कम पढ़े-लिखे स्‍वर्गीय शेख अब्‍दुल्‍ला के मन्त्रिमण्‍डल में। शेख साहिब ने उन्‍हें किसी आवश्‍यक सरकारी काम के लिये प्रवास पर जाने के लिये कहा। मन्‍त्री जी ने कहा कि उनकी कार तो खराब है। शेख साहिब ने कहा कि जाना बहुत ज़रूरी है और तुम मेरी कार ले जाओ।

बनिहाल पास की चढ़ाई पर गाड़ी झटके से बन्‍द हो गई। मन्‍त्री जी ने ड्राईवर से पूछा क्‍या हुआ। ड्राईवर ने बताया कि चढ़ाई में गाड़ी की मोशन टूट गई है।

अब गाड़ी थी शेख साहिब की। मन्‍त्री जी घबरा गये। कहा, भईय्या जितने भी पैसे लगें गाड़ी की मोशन ठीक करवा दो वरन् शेख साहिब बहुत नाराज़ होंगे।

(किसी ने सुनाया था)

Crime against Women COURT, the Real and 'Kangaroo'


Crime against Women
COURT – the Real and 'Kangaroo'

The media and women's rights activists have raised eyebrows over what they call a "Kangaroo court" having let off a man accused of molesting a woman with just an apology. As per a report in The Times of India February 11 (http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-02-11/india/37038653_1_police-station-kangaroo-court-molester) a group of elders of the village held their 'court' on the premises of Hansi police station and decided to let off a "molester" after his merely offering an apology. Following the "Kangaroo court" verdict the alleged accused is reported to have "touched the feet" of the victim's grandfather "in full public view and apologized assuring that he would not repeat his act." The matter was not reported to the police.

The critics of the decision do have a point as to how the people could – or were allowed to – hold a 'court' within police station premises. The settlement arrived at also holds mirror to the fact that they have less faith in the process of investigation and ultimate justice. That is why they preferred a verdict of the elders.

But there is hardly a ground for raising eyebrows at the verdict of the elders, described as a "Kangaroo court" in the light of leniency and consideration the Supreme Court (SC) has shown to a convict Mohinder Singh guilty of a much more heinous a crime. He had been sentenced to death by the lower court as if felt it was the rarest of the rare cases. The history of the conduct of the condemned man speaks for itself. He committed the crime while on parole from jail where he was undergoing a 12-year sentence for raping his 12-year-old daughter. In January 2005, he came out on parole and killed his wife who was a witness to the rape, and the daughter he had raped.
But on appeal by the accused the SC on January 29, 2013 ruled that the man need not be sent to the gallows "as the crime did not fall under the rarest of rare cases". The SC further said that "his reformation is not foreclosed in this case." (http://zeenews.india.com/news/nation/sc-commutes-death-sentence-of-man-to-life-imprisonment_825781.html)  

The verdict of the so-called "Kangaroo court" too needs to be viewed in the same light as the "reformation" of accused before this assembly of elders too "is not foreclosed in this case."  In the light of this verdict, how can howlers be raised for the nature of justice dispensed by the "Kangaroo court" in the instant case?

Monday, February 11, 2013

आज की फुहार 12-02-2013 स्‍टेशन पर ही मिल लेंगे


आज की फुहार                             12-02-2013

स्‍टेशन पर ही मिल लेंगे

शुरू-शुरू में जो राज सरकारें बनी उन में अधिकतर मन्‍त्री वह थे जिन्‍होंने पार्टी के लिये तो बहुत काम किया था पर पढ़े-लिखें कम थे। ऐसे ही एक मन्‍त्री ने अपने अधीन एक अफसर के घर फोन किया। फोन अफसर की पत्नि ने उठाया। उसने बताया कि उनके पति तो 'आऊट आफ स्‍टेशन' हैं।

मन्‍त्री महोदय ने कह दिया, ''कोई बात नहीं। हम भी (रेलवे) स्‍टेशन पर ही जा रहे हैं। वहीं बातचीत कर लेंगे उनसे।''

(किसी ने सुनाया था)

Tuesday, February 5, 2013

"POWER IS A POISON"


In Retrospect
POWER IS A POISON
Gandhis confuse themselves – and the nation

  
In his maiden speech at Jaipur after accepting the post of Vice-President of the Indian National Congress, Mr. Rahul Gandhi on January 20, 2013 said: "Last night… My mother came to my room and she sat with me and she cried... because she understands that power so many people seek is actually a poison.” (http://www.thehindu.com/news/national/my-mother-cried-she-understands-power-is-poison-rahul/article4326095.ece)
It is difficult to fathom this philosophy of "power" being "a poison", particularly because politics is a game of power in which every winner gets the trophy of power and, further, nobody likes his hard work to be crowned with the booty of "poison".
Politicians are not saints who meditate and suffer in silence in jungles and high hills renouncing every comfort and pleasure in their zest to realise the Divine. They are men and women of this very world who, like saints, can renunciate and sacrifice everything, even their principles and morals, but only to propitiate the goddess of power.
If politicians have not to "chase" and "seek power", what for on earth are they here? If a person is chasing a beautiful woman neither for her love, nor for her company or for marriage, what for is he following her then?
Equally difficult is it to fathom the import and substance of the message did she want to convey to her son. Was she beckoning him to desist from the path to attain power he had embarked upon? Or did she want her son not to taste power which, to her, was "a poison"? If power is a "poison” why should she make him Vice-President of the Party and make him chase "power" which is "poison"?  
In retrospect, it looks as if both Mr. Rahul Gandhi and Mrs. Sonia Gandhi have come to believe that by just making him the Vice-President of the Party, the Party has bestowed him power which, in political parlance, is only political power which, in Mrs. Gandhi's own words," so many people seek is actually a poison.” But "power" is not conferred by political bosses and parties. In a democracy, it is – and can be – accorded by the people and people alone. One attains power only when voted into office through an election and elections to the Lok Sabha are about 15 months away and – for that matter, even Mrs. Sonia Gandhi – has not so far declared publically that he is the party's prime ministerial face.  
 Further, when Mr. Rahul has been enlightened by his mother that "power is a poison" why should she allow him to taste it and why should he do so?
Mr. Rahul earned a great applause even from PM Dr. Manmohan Singh when he said “We should not chase power, only use it to empower others.” But that too remains incomprehensible because one cannot "empower others" just by not chasing "power". It is only after first winning and possessing power that one can be capable enough to "empower others". How can a powerless person empower others?
In democracy, it is the people who have the ultimate power.  In an election they delegate their power to individuals and political parties of their choice and empower these organizations to rule over them. But if the people themselves do not possess this power, how can they empower others to run and rule the country?
Mr. Rahul went on to say that his mother could see that power is poison “because she is not attached to it. The only antidote to this poison for all of us (is) to see what it really is and not become attached to it. We should not chase power for the attributes of power. We should only use it to empower the voices.”
To say that Mrs. Sonia Gandhi could see that power is poison "because she is not attached to it" seems farcical in the face of reality of the situation. Moreover, it remains beyond comprehension because she is still seen pushing her son to the pinnacle of power which she sees as "poison".   
Mr. Gandhi – and his mother – seem to have had in their mind the tragedies that befell on them following the unfortunate assassinations, first  of his grand-mother Mrs. Indira Gandhi as prime minister in 1984 and, later, of his father former prime minister Rajiv Gandhi in 1991. Perils are an essential part of life and more so of political one. Every individual and family, all over the world, whosoever seeks the luxury and glamour of power is exposed to these dangers and risks.
Tragedies and assassinations have visited individuals and families which were elected to power in democracies, in monarchical regimes, and even on dictators who usurped power through the gun and perpetuated it with terror and tyranny. Yet, that has never been able to prevent people from embarking on a voyage to seek power for fear of it being a "poison".
Therefore, whether it is a "poison" or not, persons like Mr. Rahul Gandhi will continue to "chase power" and they will always remain "attached to it". His grand-mother Indira Gandhi and his father Rajiv Gandhi did chase power and got it. They did "become attached to it" and wished to cling to it as long as they could. Therefore, whatever the rhetoric, the fact remains that both Mrs. Sonia Gandhi and Mr. Rahul Gandhi will continue to remain always "attached to power". That it is a "poison" could just be a sermon for others – and not for Mr. Rahul – to follow.