Tuesday, April 30, 2013

India's prevarication on Sarabjit -- Why is India's generosity not reciprocated?

India's prevarication on Sarabjit
Why is India's generosity not reciprocated?  

There is nothing unusual in a government taking extra-special care of its nationals who get involved in an activity that constitutes a crime in an alien country. Governments go out of their way to get concessions and reprieve from other countries for their nationals – the concessions that are not, sometimes, available to their own countrymen in their own country. It is the rule, not an exception, in the conduct of international affairs between nations the world over. There are numerous instances in the past. Let us recall only the recent ones.
The latest is the case of the two Italian marines Salvatore Girone and Massimiliano Latorre charged with killing two Kerala fishermen. The Italian government raised a hell with the Indian government to save them, at all cost. When the two were initially arrested, the then Italian Prime Minister even threatened his Indian counterpart with dire consequences on the bilateral relations between the two countries.

India has treated the duo not as accused facing trial for murder but as VVIPs. First, they were allowed a one month's vacation for Christmas. Then, after two months they were allowed to go to Italy for full one month to exercise their right to franchise. No mortal of Indian origin charged with murder or any other heinous crime is allowed parole to celebrate Dussehra, Diwali, Holi, Navratras, Ramzan, Christmas or the like. No accused in jail have ever been allowed to visit their native places to exercise their democratic right to franchise even for a day. Even our elected representatives in Central and State legislatures facing similar charges in courts are not extended this privilege.

The Italian government first refused to send the two back for trial as promised. It was at the pain of action by the Supreme Court of India against the Italian Ambassador in India that the Italian government resiled and sent the two back to India, bot not before it hammered out further concessions for the duo – no death penalty and "good living conditions" being interpreted as a sort of house arrest under the care of the Italian ambassador. All this, in spite of the fact, that there is no extradition treaty between the two countries.  

The VVIP treatment meted out – and assured – to the Italian accused violates the provisions in Article 14 of the Constitution of India which provides that the "State shall not deny to any person equality before the law or the equal protection of the laws within the territory of India on grounds of religion, race, caste, sex or place of birth" (emphasis added). Article 15 prohibits discrimination on the same grounds.
Whether a person is guilty or innocent of the charge brought against should, or should not, face death penalty or whether the crime is "the rarest of the rare cases" is the exclusive jurisdiction of the judiciary and not of the executive, i.e. the Government of India. But our Foreign Minister Salman Khurshid stated that "this case would not fall in the category of matters which attract the death penalty, that is to say the rarest of rare cases."  Our Prime Minister Dr. Manmohan Singh has, in the past, decried the judicial "overreach" of the courts. Does Khurshid's assurance not amount to executive "overreach"?
Another is the case of the Purulia arms dropping on the night of December 17, 1995, when an AN-26 aircraft dropped arms and ammunition in West Bengal's Purulia district. The consignment had hundreds of AK-47 rifles, pistols, anti-tank grenades, rocket launchers and thousands of rounds of ammunition. A criminal for case waging, or attempting to wage war, or abetting waging of war, against the Government of India and a conspiracy under various sections of the Indian Penal Code, the Arms Act, the Explosive Act, the Explosive Substances Act and the Aircraft Act, 1934. Yet, the arrested Latvian crew members were released from a prison in Kolkata in 2000 after requests from Russian authorities while another accused Bleach was given a presidential pardon in 2004 following requests by British government. Proceedings for the extradition of the main accused Kim Davy from Denmark are still under way.

But Manmohan government has proved itself an exception to the rule. It has failed to be vigilant enough in protecting the life of Sarabjit Singh languishing in Lahore Jail in Pakistan for more than 22 years after having been convicted by a Pakistani court. After the hanging of Pakistani terrorist Kasab for the 26/11 Mumbai case, the various terrorists groups, like LeT operating from Pakistani soil, had threatened "revenge". The UPA Government should have anticipated that the easiest and soft target could be Sarabjit Singh. It should have taken up the matter in right earnest to protect his life. Why the Manmohan government didn't and failed to make Pakistan guarantee Sarabjit's safety remains a mystery. It is a display of the Manmohan government's strength or weakness remains anybody's guess.

Monday, April 29, 2013

महिलाओं के विरूद्ध अपराध रोकने केलिये हम भी तो कुछ करें

महिलाओं के विरूद्ध अपराध रोकने केलिये हम भी तो कुछ करें

कहते हैं कि फ्रांस में रहने वाली एक भारतीय लड़की भारत  आई तो वह प्रख्‍यात कवि स्‍वर्गीय रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर से मिली। उस लड़की ने उन्हे बताया कि फ्रांस में यदि कोई लड़का किसी सोई लड़की के दस्‍ताने चुपके से उतार ले और उसे पता न चले तो उसे उस लड़की को को चूमने का अधिकार मिल जाता है। थोड़ी ही देर में दस्‍ताने पहने वह लड़की सोफे पर ही लुढ़क गई और उसे नींद आ गई। कौतुहल में रवि बाबू ने आहिस्‍ता-आहिस्‍ता उस लड़की के दस्‍ताने उतार दिये। जब वह लड़की जागी तो उसने देखा कि उसके दस्‍ताने उतार लिये गये हैं। वह हड़बड़ा उठी। रवि बाबू ने चुपचाप उसे दस्‍ताने लौटा दिये और कोई मांग नहीं की। उस समय रवि बाबू बहुत युवा थे और अविवाहित ।
उस समय न तो सिनेमा था, न टीवी, न नग्‍न व भड़कीले चित्रों से भरपूर रंगीन पत्र-पत्रिकायें और न इन्‍टरनैट ही। न स्‍कूलों में तब यौनशिक्षा का ज्ञान ही दिया जाता था। पर यदि आज का आधुनिक ज़माना होता तो लड़का चाहे दस साल का ही क्‍यों न होता, वह कई दिल दहला देने वाले दिलेराना करिश्‍में कर दिखाता जो रवि बाबू सोच भी न पाये होंगे।
आज आये दिन बलात्‍कार व महिला उत्‍पीड़न के नये-नये किस्‍से घटित हो रहे हैं। उनके पीछे कानून की ढिलाई से ज्‍य़ादा समाज में व्‍याप्‍त वातावरण का हाथ अधिक है। वस्‍तत: यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि हम बेहद पाखण्‍डी इनसान हैं जिन्‍हें अक्‍़ल सब कुछ लुट जाने के बाद आती है, पहले नहीं।
बलात्‍कार और महिलाओं के साथ दुर्व्‍यवहार पर मचे हो-हौआ को ही लीजिये। जब 16 दिसम्‍बर की शर्मनाक घटना घटी तो क्‍या-क्‍या नहीं घटा। सरकार ने भी बहुत ड्रामा किया और जनता ने उससे भी अधिक। सरकार ने अपराधियों को दो मास में सज़ा सुना देने की बात की। चार मास से अधिक हो गया पर यह कहना कठिन है कि कब।
तब लोग छातियां पीट-पीट कर चिल्‍ला-चिल्‍ला कर कहते थे कि अपराधियों को सूली पर लटका दो। जब अपराधियों को फांसी देने का प्रावधान करने की बात आई तो कई इधर-उधर झांकने लगे। कुछ कहने लगे कि ऐसे समय जब विश्‍व फांसी की सज़ा समाप्‍त करने की ओर बढ़ रहा है तो हम फांसी की सज़ा देने के लिये नये से नये अपराध जोड़ते जा रहे हैं।
हमारे कानून में कमियां बहुत हैं। पर इन हालात केलिये उससे भी अधिक दोषी है हमारा समाज जिसमें अनगिनत विकृतियां हैं। पहले कभी कोई लड़का किसी को बहन कह देता था या लड़की किसी को भाई तो वह भाई-बहन हो जाते थे और उसकी मर्यादा निभाते थे। आज तो महिलायें, बहुयें, बेटियां, बहनें व कमसिन बच्चियां अपने पिता, भाई, ससुर, देवर आदि से ही अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं। आये दिन ऐसे शर्मनाक समाचार आ रहे हैं। यह सारा कसूर समाज का है, कानून या उसकी ढिलाई का नहीं।
जब हम देश में भूमण्‍डलीय व्‍यवस्‍था व पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता के लिये द्वार खोलते जस रहे हैं तो उसके साथ दहेज में बुराइयां तो आयेंगी ही। हम उनकी ओर ध्‍यान नहीं देना चाहते।
अपने कपड़े उतार कर पैसे के लिये अपने फोटो खिचवाना व  सिनेमा, टीवी, पत्र-पत्रिकाओं में दिखाना अभिव्‍यकित की स्‍वतन्‍त्रता मानते हैं। हम कहते हैं कि अश्‍लीलता अपना शरीर दिखाने वालों के मन में नहीं उसे देखने वालों के मन में है। उसका अधपके अव्‍यस्‍क किशोर-किशोरी मन पर कोई दुष्‍प्रभाव नहीं मानते। अनेक बार समाचार आते हैं कि किसी बच्‍चे या अपराधी ने अमुक अपराध अमुक फिल्‍म या सीरियल से प्रेरणा प्राप्‍त कर अंजाम दिया। ऐसी फिल्‍मों, पुस्‍तकों, पत्र-पत्रिकाओं, सीरियल आदि पर प्रतिबन्‍ध लग जाये या किसी फिल्‍म का कोई दृश्‍य या गाना सैंसर बोर्ड काट दे तो यह विचार अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता पर कुठाराघात बन जाता है। भारत में स्‍वतन्‍त्रता व जनतन्‍त्र पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह खड़ा कर दिया जाता है।
हमें विश्‍व के साथ कदम से कदम मिला कर चलना है। इसलिये हमारे शहरों में नाइट लाइफ होनी चाहिये। पब होने चाहिये। शराब पीने की स्‍वतन्‍त्रता होनी चाहिये। अब तो मांग चल रही है कि शराब पीने की उम्र भी कम कर दी जाये। पर शादी की उम्र बढ़ा कर लड़की के लिये 18 और लड़के के लिये 21 ही है। लड़का-लड़की शराब तो इससे कम उम्र में पी सकते हैं पर शादी नहीं कर सकते। जब नाइट लाइफ का लुत्‍फ उठा कर रात को लोग पब से निकलेंगे तो वह नशे में तो होंगे ही क्‍योंकि वह वहां मौज-मस्‍ती करने आये थे, माला जपने नहीं। जब आधी रात के बाद कोई महिला या पुरूष नशे की हालत में बाहर निकलेगा तो ऐसे मौके का फायदा उठाने के लिये कोई अपराधी भी ताक में बैठ सकता है। शराब के नशे में जब कोई गाड़ी चलायेगा तो पुलिस उसका चालान भी कर सकती है। उनकी ऐसी नशे की हालत का कोई व्‍यक्ति ग़लत लाभ भी उठा कर सकता है।
मात्र कानून को ही सख्‍त करने से अपराध ओझल नहीं हो सकते। समाज को भी कुछ सावधानियां बर्तनी होंगी ताकि कोई अप्रिय घटना न घटे। यह ठीक है कि हमें रात के किसी भी समय घर से बाहर निकलने व पार्क या बाग़ में घूमने की पूरी स्‍वतन्‍त्रता होनी चाहिये। पर इसके साथ इस स्‍वतन्‍त्रता व हक का मज़ा उठाने की जोखिम उठाने के लिये भी तो हमें तैय्यार रहना होगा। एक सभ्‍य व सुशील समाज में किसी व्‍यक्ति को किसी भी समय कितनी भी बड़ी रक्‍़म लेकर चलने की पूर्ण स्‍वतन्‍त्रता तो होनी ही चाहिये। पर उसे साथ ही सावधानी भी बर्तनी होगी। यदि मैं एक पारदर्शी थैले में दस लाख रूपये अपने कन्‍धे पर लटका कर रात के बारह बजे बाद किसी सुनसान सड़क पर घूमता फिरूं और कोई यह राशि लूट कर ले जाये तो पुलिस या कानून क्‍या कर लेगा\
इस लिये जहां कानून को कठोर बनाने की आवश्‍यकता है कि  अपराधी सज़ा से न बच निकले वहीं समाज को भी पूरी सावधानी बर्तेने का अपना कर्तव्‍य निभाना होगा जिससे कि अपराध की भावना न पनपे। यदि हमें बाह्य संस्‍कृति को ही अपनाना है तो हमें उस के साथ आने वा‍ली बुराईयों को भी स्‍वीकार करना पड़ेगा। हमें केक खाने और उसे अपने पास संजो कर रखने का प्रपंच व ढोंग नही रचना होगा।

Saturday, April 27, 2013



The JD(U) has recognized the right of BJP as the largest constituent of the NDA  to have its prime ministerial candidate stressing that it would support him/her only if he possessed “secular credentials”.
But neither JD(U) nor any other political organization has so far ever been able to define what constitutes “secular credentials”. So how to determine who has these and who doesn’t?
By all counts, India is – and has been -- a secular country all through.  India’s Constitution too has been secular in word and spirit. Yet, for reasons unexplained – and perhaps to appeal to the constituency of minority votes – the late Prime Minister Mrs. Indira Gandhi, through a Constitutional amendment in 1976 got the words “secular” and “socialist” added to the Preamble to the Constitution.
That Mrs. Gandhi did not, deliberately, venture to define the word “secular” is a clear indication to the functioning of her mind at that time. She wanted to keep it vague to use it as a tool against her opponents.
In fact, secularism in India has less to do with society and more with politics. It is a tool to strike at one’s opponents. Here every political and organisation claims to be ‘secular’ and lashes ouy at its opponent as ‘communal’. An individual and political party remains ‘communal’ as long as they remain antagonistic to the other. The moment they change their stand and support the other, overnight they become secular. In 1996 the United Front of H. D. Deve Gowda tried its best to rope in Akali Dal into its fold. When it failed, like grapes are sour, Akali Dal too became ‘communal’.
Except perhaps for Congress (though some Congress leaders did join BJP), at one time or the other since 1967 when Congress was enemy No. 1 of communist and socialist parties, the latter entered into a marriage of convenience to share the bed of power with Jana Sangh and later avtar Bharatiya Jana Sangh. They had no qualms of conscience when in 1977 they invited the ‘communal’ Jana Sangh with declared RSS links to merge with their parties to form a new political outfit called Janata Party which dethroned the mighty Congress from power at the Centre and many States. Everything worked smoothly till Janata Party remained in power. It was only after losing power that the thorn of Jana Sangh ‘communalism’ started pricking them. The great ‘secularist’ late V. P. Singh had no hesitation to welcome Jana Sangh’s new avtar BJP’s outside support to get PM’s throne. The conscience of communist parties did not prick when they shared common blocks of UF supporters in Parliament. The Muslim outfits like the Indian Union Muslim League, the successors to Jinnah’s Muslim League,  whose membership is restricted to Muslims only, are ‘secularists’ and Akali Dal and BJP who have every caste and religion in their fold are branded ‘communal’ when they do not see eye to eye with some self-proclaimed ‘secularists’.
‘Secularism’ is an alien concept which emerged in the West broadly meaning that the Church will have nothing to do with administration. Still it has no standard or legal definition.  This puts a great flexibility in the hands of our politicians.  A great hoax and hypocrisy, in instance, is the support and opposition to the Babri masjid and Ram Mandir in Ayodhya. For all intents and purposes, both are religious issues, though the Mandir has nationalist connotation too. Yet, those who support Masjid are ‘seculars’ and those who champion the cause of the Mandir ‘communalists’. Nobody can explain the logic and ‘secularists’ remain self-righteous.
At times, secularism comes in conflict with the spirit of nationalism and ‘secularists’ are too willing to sacrifice their nationalism at the altar of ‘secularism’. That explains the fact that when Gujarat chief minister Narendra Modi defined secularism as “India first”, it raised  our ‘secular-liberal’ intelligentsia’s eyebrows. “India first” means that country comes first; we are Indians first and our religion, caste, region and language come afterwards. But that does not humour the ‘secularists’.
Various scholars have tried to define ‘secular’ in their own way. The most appropriate working definition which could suit the Indian conditions seems to be that of Donald E. Smith, Professor of Political Science in Pennsylvania University who said a secular state is the one “which guarantees individual and corporate freedom of religion, deals with the individual as a citizen irrespective of his religion, is not constitutionally connected to a particular religion, nor does it seek to promote or interfere with religion". 
Going by these definitions or by its own concept JD(U) needs to enumerate what it calls “secular credentials” and how does a person, like  Mr. Narendra Modi, does not possess it.   
If the 2002 riots stands in the way of “secular credentials” of a person like Mr. Modi, how could, in these circumstances,  how does the blot of’84 riots does not in the way of Mr. Rajiv Gandhi and his Congress who continue to be the epitome of ‘secularism’? In that case, Nitish’s new found infatuation for Congress motivated by whatever reasons may put his own “secular credentials” in question.
There is something more than meets the eye in the design of JD(U)’s latest hostility towards Mr. Modi. Even for the 2009 Lok Sabha polls BJP had declared its prime ministerial candidate only in December 2008. But   JD(U) has been raising the pitch for the last more than six months back for BJP coming out with its hopeful, about more than 18 months earlier. And mark the stark contrast. Nobody in the UPA is raising heckles for naming its prime ministerial candidate here and now. The common refrain with politicians when asked by media on such matters is that “they will cross the bridge when it comes”. But JD)U), for unexplained reasons, seems to be wanting to strategise how to cross the bridge that is, as yet, miles and miles away.

Tuesday, April 23, 2013

आज की फुहार पिताजी कौनसे -- जापान वाले, अमरीका वाले..... ? (23-04-2013)

 आज की फुहार
पिताजी कौनसे -- जापान वाले, अमरीका वाले..... ?

एक व्‍यक्ति व्‍यर्थ में ही दूसरों पर अपने आपको बड़ा रईस होने का रौब जमाना चाहता था। उसके लिये उसने एक नौकर रख लिया। उसने उसे समझा दिया कि जब भी उसके पास कोई व्‍यक्ति आये और उसके सामने वह कोई चीज़ लाने को कहे तो उससे पूछना कि सर, कौनसी जापान वाली, अमरीका वाली, लन्‍दन वाली, जर्मनी वाली, फ्रांस वाली आदि आदि। इस प्रकार उसका आगन्‍तुक पर बड़ा दबदबा बन जाता।
नौकर को आदत सी हो गई। जब भी मालिक उससे कोई चीज़ मांगता तो वह यही पूछता। होती तो उसके पास एक ही चीज़ थी। तो वह किसी देश का नाम लेकर कहता कि वहां वाली। इस प्रकार नौकर के मुंह पर यह प्रश्‍न स्‍वाभाविक बन गया था जो एक दम फूट निकलता जब भी उसका मालिक कुछ भी मंगवाता।
एक बार ऐसा हुआ कि उसके पिताजी को काई मिलने आ गया। तो उसने नौकर को कहा कि पिताजी को बुलाओ।  अपनी आदत से मजबूर नौकर ने मालिक से अपना रटा-रटाया सवाल दोहरा दिया, ''कौनसे पिताजी? अमरीका वाले, लन्‍दन वाले, फ्रांस वाले, लाहौर वाले........... ?''
(किसी ने सुनाया था)

Sunday, April 21, 2013

व्‍ंयग -- राजनीति के दाव-पेच तू उनसे ही पूछ

राजनीति के दाव-पेच तू उनसे ही पूछ

बेटा:     पिताजी।
पिता:    हां बेटा।
बेटा:     आज मुझे आपसे लम्‍बी चर्चा करनी है।
पिता:    पर बेटा, पर किस विषय पर?
बेटा:     आज की राजनीति पर पिताजी।
पिता:    बेटा, मुझे राजनीति की समझ तो कम है पर फिर
    भी कर चर्चा।
बेटा:     पिताजी, श्रीमति सोनिया गांधी 5 वर्ष की उस बच्‍ची
का कुशलक्षेम पूछने अस्‍पताल पहंची जहां उसका इलाज चल रहा था।
पिता:        बेटा, वह बहुत महान् महिला हैं। उन्‍होंने एक
मानविक फर्ज़ निभाया है।
बेटा:     पर पिताजी हमारे पड़ोस की बच्‍ची भी तो अस्‍पताल
में जि़न्‍दगी और मौत से लड़ रही है, उसे कोई महानुभाव देखने नहीं आया
पिता:    तू बड़ा मूर्ख है। उसके साथ कोई बलात्‍कार हुआ है जो कोई उसे देखने जाये?
बेटा:     चलो, यह तो समझ आ गया। पर पिताजी, सोनियाजी ने तो यह भी कहा है कि अब बातों का नहीं कुछ कर दिखाने का समय आ गया है।
पिता:    ठीक ही तो कहा है बेटा।
बेटा:     इसका तो मतलब यह हुआ कि अभी तक सरकार बातें ही कर रही थी।
पिता:    यह तो बेटा मैं नहीं कह सकता।
बेटा:     हमारे प्रधान मन्‍त्री भी आये दिन की बलात्‍कार की घटनाओं से बहुत दु:खी हैं।
पिता:    यह तो स्‍वाभाविक ही है बेटा। हमारे प्रधान मन्‍त्री बहुत नेक इन्‍सान हैं। उनका दिल ऐसी मार्मिक घटनाओं से जल्‍दी पिघल जाता है।
बेटा:     पर पिताजी, एक रिपोर्ट के अनुसार तो हमारे देश में हर दो घंटे में एक बलात्‍कार हो जाता है। ऐसी स्थिति में तो उनका बहुत बुरा हाल जो जाता होगा?
पिता:    इसमें तो कोई शक नहीं बेटा।
बेटा:     पिताजी, एक और खबर बड़ी चर्चा में है।
पिता:    क्‍या बेटा?
बेटा:     समाचारों के अनुसार संयुक्‍त संसदीय समिति ने 2जी स्‍पैक्‍ट्रम स्‍कैम में प्रधान मन्‍त्री और वित्‍त मन्‍त्री को किसी दोष से मुक्‍त कर दिया है। उसने इस भ्रष्‍टाचार का सारा दोष तत्‍कालीन संचार मन्‍त्री ए राजा के सिर मढ़ दिया है।
पिता:    इसमें कौनसी बड़ी बात है? हमारे तो प्रधान मन्‍त्री इतने भोले व सज्‍जन पुरूष हैं कि उनके बारे कुछ ऐसा सोचा ही नहीं जा सकता कि वह कुछ अनैतिक कर सकते हों। उसी प्रकार हमारे वित्‍त मन्‍त्री भी बहुत गुणी और विद्वान् हैं। आखिर जि़म्‍मेदारी तो मन्‍त्री ही की बनती है न।
बेटा:     पर पिताजी, आपको पता है कि हमारे संविधान में यह प्रावधान है कि हर ठीक-ग़लत कार्य केलिये मन्त्रिपरिषद सांझे रूप से उत्‍तरदायी होगी।
पिता:    मैंने तुझे पहले ही कहा कि मैं सरकार, संविधान व राजनीति के इन दाव-पेचों से अनभिज्ञय हूं।
बेटा:     पर पिताजी, इसी प्रकार कोलगेट घोटाला भी हुआ है। तब प्रधान मन्‍त्री इस विभाग के प्रभारी मन्‍त्री थे। फिर भी वह अपने आपको इस सब से बड़े घोटाले के लिये दोषी व उत्‍तरदायी नहीं मानते जैसे कि ए राजा को माना जा रहा है। यह विरोधाभास क्‍यों?
पिता:    मैंने बेटा तुम्‍हें पहले ही बता दिया कि मैं इन सरकारी व राजनीतिक खेलों की बारीकियां मेरी समझ से बाहर हैं। तू यह सब उनसे ही पूछ। 

Monday, April 8, 2013

कांग्रेस ने बनाया नरेन्‍द्र मोदी को धर्मराज

कांग्रेस ने बनाया नरेन्‍द्र मोदी को धर्मराज

राजनीति वस्‍तुत: एक अखाड़ा ही बन गई है जहां राजनीति के पहलवान बुद्धि से नहीं दाव-पेच से जीतते हैं। पर कई बार यह दावपेच उल्‍टे भी पड़ जाते हैं। इसका नवीनतम् उदाहरण है कांग्रेस पार्टी की वह प्रतिक्रिया जो उसने तब दी जब गुजरात के  मुख्‍य मन्‍त्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि गुजरात के बाद अब उनको देश की सेवा कर राष्‍ट्र का ऋण चुकाना है।

इस कथन पर कांग्रेस प्रतिक्रिया की तो कोई आवश्‍यकता नहीं थी, खास कर इतनी तीब्र व कटु कि कांग्रेस प्रवक्‍ता राशिद अलवी ने तो नरेन्‍द्र मोदी की तुलना यमराज से ही कर डाली। पर जो यमराज की अवधारणा को जानते हैं वह तो समझते हैं कि ऐसा कह कर तो अलवी ने मोदी की आलोचना नहीं उल्‍टे स्‍तुति ही कर डाली है। कांग्रेस के यह नेता शायद नहीं जानते कि यमराज को तो धर्मराज माना जाता है क्‍योंकि वह किसी से अन्‍याय नहीं करते। मृत्‍यु के बाद जो प्राणी उनके पास लाया जाता है वह उसके भले और बुरे कर्मों के आधार पर उसे स्‍वर्ग या नर्क भेज देते हैं। हमारी सरकार के पास तो यह अधिकार है कि वह अपने विवेक के आधार पर किसी घोर अपराधी को भी बक्ष्‍श दे पर यमराज ऐसा कुछ नहीं करते क्‍योंकि वह तो धर्मराज हैं और उन्‍हें तो बस व्‍यक्ति के कर्म के अनुसार अपना धर्म ही निभाना है। वह न पक्षपात करते हैं और न द्वेश ही। न पापी को स्‍वर्ग भेजते हैं और न पवित्र आत्‍मा को नर्क।

दूसरे, यमराज मृत्‍यु देते नहीं हैं। वह तो व्‍यक्ति को उसके भाग्‍य व कर्मों के अनुसार अपनी जीवनलीला पूरी कर लेने पर अपने पास बुला लेते हैं। प्राणी को अपने कर्मों के अनुसार दण्‍ड भोगना पड़ता है। इस प्रकार यमराज तो हमारे राजनीतिक शासकों से तो कहीं अच्‍छे हैं जो दुष्‍ट व अपराधी को राजनीतिक कारणों से संरक्षण देते हैं और सज़ा से बचाते हैं और निर्दोष की रक्षा करने में विफल साबित होते हैं।

कांग्रेस ने तो यह कह कर कि उन्‍हें आशा है कि मोदी देश के बाकी हिस्‍सों में वह कुछ नहीं करेंगे जो उन्‍होंने गुजरात में किया है, यह आभास दे दिया कि कांग्रेस अब यह मानकर चल रही है कि मोदी का तो प्रधान मन्‍त्री बनना तय ही है। कांग्रेस भूल जाती है कि सांप्रदायिक दंगों के मामले में कांग्रेस के हाथ मोदी से भी ज्‍़यादा रंगे पड़े हैं। जनता ने 2002 के दंगों के बाद गुजरात विधान सभा चुनाव में मोदी को लगातार तीसरी बार विजय दी है। जो और जितनी विजय उन्‍होंने भाजपा को दिलाई है वह अल्‍पसंख्‍यक समर्थन के बिना सम्‍भव नहीं हो सकती।

उधर यह भी एक सत्‍य है कि 2002 के दंगों के बाद मोदी के राज में गुजरात में सांप्रदायिक सौहार्द है और कोई दंगा नहीं हुआ जब कि कांग्रेस शासित प्रदेशों, विशेषकर राजस्‍थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्‍ट्र व असम में तो पिछले दो-तीन साल में कई बार हो चुके हैं और आजकल भी हो रहे हैं।

जिस दंगों की कालिख की बात कांग्रेस गुजरात में करती है, उससे तो अधिक कालिख पुती थी 1984 में सिख विरोधी दंगों में। गुजरात में हिन्‍दुओं समेत मरने वालों की संख्‍या तीन हज़ार से भी कम है जबकि 1984 में केवल दिल्‍ली में ही 3000 हज़ार से अधिक सिख मारे गये थे। तब सिख विराधी दंगे केवल कांग्रेस शासित प्रदेशों में ही घटे थे, अन्‍यत्र कहीं नहीं। सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ने वाले सिखों की संख्‍या तो सारे देश में पांच हज़ार से भी अधिक है। ऊपर से तत्‍कालीन प्रधान मन्‍त्री राजीव गांधी ने तो यह कह दिया था कि जब कोई बड़ा वृक्ष गिरता है तो नीचे की ज़मीन ज़ोर से हिलती ही है। मोदी ने तो ऐसा कुछ नहीं कहा था। गुजरात दंगों में संल्लिप्‍त कई बड़े-बड़े राजनीतिक नेता सज़ा भी भुगत रहे हैं और अनेक के विरूद्ध अदालतों में मुकद्दमें चल रहे हैं। पर सिख विरोधी दंगों के मामले में ऐसा कहना सम्‍भव नहीं है। 28 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पीडि़त सिख परिवार न्‍याय के लिये दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। ऐसी स्थिति में उंगली भाजपा व मोदी पर ही क्‍यों उठती है और कांग्रेस व राजीव गांधी पर क्‍यों नहीं।                             ***

Sunday, April 7, 2013

Why should Obama apologize for "best looking attorney general" remark?

Why should Obama apologize for "best looking attorney general" remark? 

These days it is very common to spark a controversy over nothing. The latest is the US President Barrak Obana calling on April 4 the California Attorney General Kamala Harris “the best looking attorney general.”  But what is bad, sexist or offensive in the remark?

What he had said was: “You have to be careful to, first of all, say she is brilliant and she is dedicated and she is tough, and she is exactly what you’d want in anybody who is administering the law, and making sure that everybody is getting a fair shake.  She also happens to be by far the best-looking attorney general in the country — Kamala Harris is here.”

Is calling a woman as the "best looking" an offence? Is she not the "best looking" that it should be taken as an offence? Is being a "good looking" something to feel ashamed and bad about it for a woman? If a woman is beautiful, does calling her so sexist and offensive?
Do we not take pride in calling young men as a very smart, handsome young, a most eligible bachelor or spinster? Our magazines are every other day replete with declaring our women and men as the "most desirable" individuals. Does it amount to something abusive of the individual?

And what for did Mr. Obama apologise then?

Friday, April 5, 2013

आज की फुहार मेरी पत्नि की ज़ुबान बन्‍द हो गई है

 आज की फुहार                                                                 
मेरी पत्नि की ज़ुबान बन्‍द हो गई है

एक व्‍यक्ति ने बड़ी घबराहट में अपने डाक्‍टर को फोन किया, ''डाक्‍टर साहिब, जल्‍दी मेरे घर आइये। मेरी पत्नि की ज़ुबान बन्‍द हो गई है। मैं बहुत परेशानी में हूं''।

डाक्‍टर ने उससे सारी बीमारी और उसके लक्षण पूछे और समझे। फिर बोला, ''देखो कई बार ऐसा हो जाता है। तुम्‍हारी पत्नि पांच-छ: दिन में अपने आप ही ठीक हो जायेगी। बाकी मैं घर आकर देखता हूं''।

पति को तब सांस में सांस आई। बोला, ''यदि चिन्‍ता की बात नहीं है तो आप भी आने का कष्‍ट न करें जब पांच-छ: दिन में सब ठीक ही हो जाना है''।
(शायद कहीं पढ़ा था)

Wednesday, April 3, 2013

यदि शासक नेक सलाह सुननी बन्‍द कर दे तो

यदि शासक नेक सलाह सुननी बन्‍द कर दे तो 

रामायण का एक प्रसंग याद आता है। रावण सीताहरण का षड़यन्‍त्र रच रहा था। तभी उसे याद आया कि इस कार्य में उसे अपने भान्‍जे मारीच की सहायता लेनी चाहिये जिसके पास दैवीय शक्ति थी जिसके अनुसार वह कोई भी रूप धारण कर सकता था। रावण उसके पास पहुंचा और उसे अपना सारा षड़यन्‍त्र समझा दिया। उसने बताया कि मारीच को एक सुन्‍दर स्‍वर्णिम मृग का रूप धारण करना है जो राम के आश्रम के सामने से गुज़रे और सीता को उसे पाने के लिये आकर्षित व मनमोहित कर दे। वह एक ऐसा मायाजाल रचेगा कि सीता राम को उसे पकड़ने के लिये स्‍त्रीहठ से मजबूर कर देगी। जब राम उसके पीछे आयेंगे तो वह उन्‍हें अपने पीछे दूर ले जायेगा। इसी बीच वह राम की आवाज़ में लक्षमण को पुकारेगा मानों राम किसी मुसीबत में पड़ गये हों। इस पर सीता लक्षमण को राम की सहायता के लिये जाने के लिये मजबूर कर देंगी और रावण सीता का हरण कर लेगा।

सारी बात सुनकर मारीच ने रावण को कहा कि वह ऐसा न करे। ऐसा करना धर्मसंगत नहीं है और उसे शोभा नहीं देता।

रावण का पापी मन कोई नेक सलाह सुनने के लिये तैय्यार न था। उसने मारीच को कहा कि वह उससे कोई शिक्षा-प्रवचन सुनने नहीं आया है। उसने मारीच को कहा कि उसे वही करना होगा जो वह चाह रहा है।

मारीच ने रावण को एक बार फिर सोचने के लिये कहा। रावण क्रोध में आ गया। उसने मारीच को चेतावनी के स्‍वर में पूछा कि जैसा करने को वह कह रहा है तुम करोगे या नहीं\

मारीच ने कहा, ''देखो मामा, मैं तुम्‍हें नेक सलाह दे रहा हूं। आप जो करने जा रहे हैं वह पाप है और वह तुम्‍हें विनाश की ओर धकेल देगा।''

रावण गरज कर बोला, ''रावण को न करने वाला अभी पैदा नहीं हुआ। मैं तुम से शिक्षा लेने नहीं आया। बताओ कि तुम करते हो कि नहीं\''

मारीच ने शान्‍त भाव से कहा, ''मामा, मेरी एक बात याद रखना जब राजा एक नेक सलाह सुनना या मानना बन्‍द कर दे तो समझो उसके बुरे दिन आ गये।  तुम जैसा कह रहे हो मैं वह करने को तैय्यार हूं क्‍योंकि यदि मैं मना कर दूंगा तो तुम मुझे मार दोगे। इस लिये तुझ पापी के हाथों मारे जाने की बजाय राम के तीर से मारे जाना श्रेयस्‍कर है। मुझे स्‍वर्ग तो मिलेगा।''  

Tuesday, April 2, 2013

आशीर्वाद का महत्‍व

आशीर्वाद का महत्‍व

महाभारत का एक किस्‍सा याद आता है। कौरवों और पांडवों की सेनायें अपने निर्णायक युद्ध के लिये कुरूक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी हो चुकी थीं। युद्ध का बिगुल बजने वाला था कि पांडवों के ज्‍येष्‍ठ भाई युधिष्‍ठर अपने रथ से उतरे और सामने युद्ध के लिये तैय्यार कौरवों की ओर प्रस्‍थान करने लगे। सब चकित थे।

दुर्योधन ने फबती कसी, ''वह युद्ध से घबरा गया है और युद्ध से पहले ही क्षमा याचना के लिये हमारी शरण में आ रहा है''।

युधिष्‍ठर पहले अपने कुलगुरू कृपाचार्य के पास गये जो कौरवों की ओर से रणभूमि में खड़े थे। युधिष्‍ठर ने कुलगुरू को प्रणाम किया और उनसे आशार्वाद मांगा। कुलगुरू ने आशीर्वाद दिया, ''विजयी भव।''

उसके बाद युधिष्‍ठर अपने गुरू द्रोणाचार्य के पास गये। उनके पांव छू कर उनसे भी आशीर्वाद की याचना की। द्रोणाचार्य से भी उन्‍हें ''विजयी भव'' का ही आशीर्वाद मिला। द्रोणाचार्य ने आगे कहा, ''युधिष्‍ठर, अपने कनिष्‍ठ भाई अर्जुन को मेरा सन्‍देश देना कि जब युद्ध में मेरे पर बाण चलाये तो वह तनिक भी विचलित न हो कि मैं उसका गुरू हूं। मुझ पर वह बाण ऐसे चलाये जैसे कि मैं उसका घोर शत्रु हूं और मुझे मारना उसका परम कर्तव्‍य है। वरन् मैं समझूंगा कि अर्जुन को दी गई मेरी शिक्षा-दीक्षा में मुझ से कुछ कमी रह गई है''।

''जो आज्ञा, गुरूदेव'' कह कर युधिष्‍ठर भीषम पितामह की ओर बढ़ गये।

इसी बीच दुर्योधन दोनों गुरूओं के युधिष्‍ठर को दिये गये आशीर्वाद से जल-भुन रहा था।

युधिष्‍ठर ने पितामह का चरणस्‍पर्श किया और आशीर्वाद मांगा। पितामह ने भावविभोर होकर युधिष्‍ठर के सिर पर हाथ रखा और कहा, ''पुत्र, विजयी भव।''

यह देख और सुनकर दुर्योधन आगबबूला हो उठा। गुस्‍से में जलते हुये बोला, ''मैं तो युद्ध आरम्‍भ होने से पहले ही हार गया जब मेरे दोनों गुरूओं व मेरे प्रधान सेनापति ने मेरे शत्रु को विजयी भव का आशार्वाद दे दिया।'' भीषमपितामह कौरवों के प्रधान सेनापति थे।

यह सुन पितामह बोले, ''पुत्र दुर्योधन, यह अहम् ही तेरा सब से बड़ा शत्रु है। युधिष्‍ठर भी तेरा बड़ा भाई ही है। उसका आशार्वाद प्राप्‍त करना भी तेरा धर्म था। यदि तू भी उसके चरणस्‍पर्श करता तो युधिष्‍ठर का हाथ भी अपने आप ही उठकर तेरे सिर पर होता और वह भी तुम्‍हें आशीर्वाद ही देता।''